✍️ व्यंग्य
आँख मिलाने का चैलेंज
सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स
कभी अंखियों ही अंखियों में बात हुआ करती थी। नज़रें मिलती थीं और बात इतनी आगे बढ़ जाती थी कि एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी अधूरी लगती थी। इससे साफ़ है कि आँखें सिर्फ देखती नहीं, बोलती और बतियाती भी हैं। किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक पहला प्रेम निमंत्रण भी अक्सर आँखों के रास्ते ही आता है।
लेकिन अब समय बदल गया है। अब आँखों से बात कम और आँखें दिखाने का दौर ज़्यादा है। लोग बात-बात पर आँखें तरेरते हैं। उनकी आँखों का ऐसा आतंक है कि सामने वाला आँख मिलाने से पहले ही मैदान छोड़ देता है। यानी आँखें अब संवाद नहीं, दहशत का पर्याय बनती जा रही हैं।
आजकल तो लोग खुलेआम आँख से आँख मिलाने का चैलेंज देते हैं। दावा करते हैं कि कोई उनकी आँखों में झाँकने की हिम्मत नहीं कर सकता। सच भी है — आँख में आँख डालकर बात करने का साहस हर किसी में नहीं होता।
मेरे एक मित्र हैं। उन्हें अपनी आँखों की दबंगई पर इतना भरोसा है, जितना अपनी बुद्धिमत्ता पर भी नहीं। उनसे पूरब के बारे में पूछिए तो जवाब पश्चिम का मिलता है। अर्थव्यवस्था पर सवाल करें तो जूडो-कराटे की ट्रेनिंग का बखान शुरू हो जाता है। प्रचार के लिए कभी तालाब की कीचड़ में छलांग लगा देते हैं, तो कभी सभ्य लोगों की सभा में आँख दबाकर सुर्खियाँ बटोर लेते हैं।
उनकी आँखें भी बोलती हैं और जुबान भी — मगर विषय के अनुरूप नहीं, और सभ्य परिवार की गरिमा के अनुकूल तो बिल्कुल नहीं। एक दिन गर्व से बोले — “कोई मेरी आँख में आँख डालकर बात नहीं कर सकता।”
मैंने पूछा — “ऐसा क्यों?”
वह बोले — “क्योंकि मैं इतना सच्चा हूँ कि कोई झूठा मेरे सामने टिक नहीं सकता।”
मैंने कहा — “ऐसा भी तो हो सकता है कि आपकी आँख में इंफेक्शन हो, और लोग डरते हों कि कहीं उनकी आँखें भी संक्रमित न हो जाएँ।”
वह कहाँ मानने वाले थे। बोले — “नहीं, लोग मुझसे डरते हैं।”
मैंने मुस्कराकर कहा — “मित्र, शायद लोग तुमसे नहीं, तुम्हारी हरकतों से डरते हों।”
वह चौंक गए — “मतलब?”
मैंने समझाया — “हो सकता है लोग इसलिए आँख न मिलाते हों कि तुम्हारे मुँह लगकर अपना समय क्यों बर्बाद करें।”
वह तुरंत बोले — “मैं किसी से नहीं डरता। मैंने जूडो-कराटे सीखा है, सामने वाले पर ग्रिप बनाना जानता हूँ।”
मैंने कहा — “यही तो समस्या है। बात कुछ होती है और तुम जवाब कुछ और देते हो।”
वह गर्व से बोले — “यही तो मेरी खासियत है!”
मैंने कहा — “इसे खासियत नहीं, लोग या तो मंदबुद्धि समझते हैं या पागलपन।”
बस फिर क्या था — वह आवेश में आ गए। बोले — “कोई कुछ भी समझे, मैं किसी से नहीं डरता। मुखिया से भी नहीं। मैं मुखिया को चैलेंज करता हूँ — हिम्मत हो तो मुझसे बहस करे, आँख में आँख डालकर बात करे!”
मैंने हँसते हुए कहा — “तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। तुम्हारे सामने कोई टिक ही नहीं सकता।”
वह विजयी मुद्रा में बोले — “मैं भी तो यही कह रहा हूँ… अच्छा टाटा… बाय-बाय… फिनिश!”





