लेख- मदन मोहन पाठक
भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह विश्व की अग्रणी शक्तियों में स्थान बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंच पर बढ़ती प्रतिष्ठा ने देश को नई पहचान दी है। किंतु विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक उपलब्धियों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है, जिसमें प्रतिभा का सम्मान हो, अवसर निष्पक्ष हों, कानून सबके लिए समान हों, शिक्षा राजनीति से मुक्त रहे और राष्ट्रहित सर्वोपरि माना जाए।
सबसे पहले आवश्यकता है कि देश में प्रतिभा का सम्मान सर्वोच्च मूल्य बने। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके योग्य, परिश्रमी और नवाचारी नागरिक होते हैं। यदि प्रतिभाशाली युवाओं को उनकी क्षमता के अनुरूप अवसर मिलेंगे, तो वे देश को नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे। इसलिए शिक्षा, रोजगार, शोध, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्टता को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
साथ ही, आरक्षण जैसे विषय पर समाज में लंबे समय से विभिन्न मत मौजूद हैं। यह एक संवेदनशील और जटिल विषय है, जिसका संबंध सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक असमानताओं और समान अवसरों से है। इसलिए इस विषय पर भावनाओं के बजाय तथ्यों, संविधान की भावना और व्यापक राष्ट्रीय सहमति के आधार पर गंभीर संवाद होना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय और योग्यता—दोनों के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
एक सशक्त राष्ट्र के लिए कानून का समान और निष्पक्ष शासन भी अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि कानून सब पर समान रूप से लागू होता है और न्याय किसी भेदभाव से प्रभावित नहीं होता। समान अधिकारों के साथ समान उत्तरदायित्व भी लोकतंत्र की मजबूती का आधार हैं।
देश का भविष्य उसके बच्चे और युवा हैं। इसलिए उन्हें राजनीतिक संघर्षों और वैचारिक टकरावों का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों का मुख्य दायित्व शिक्षा, चरित्र निर्माण, कौशल विकास और राष्ट्र सेवा की तैयारी है। उन्हें ऐसी परिस्थितियों से बचाया जाना चाहिए जो उनकी शिक्षा और मानसिक विकास को प्रभावित करें। लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, किंतु बच्चों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं माना जा सकता।
लोकतंत्र में आंदोलन परिवर्तन का एक वैध माध्यम हैं, परंतु वे शांतिपूर्ण, संवैधानिक और जनहितकारी होने चाहिए। ऐसे आंदोलन जो हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति, जनजीवन में अनावश्यक बाधा या सामाजिक वैमनस्य पैदा करें, वे लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं। मतभेदों का समाधान संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और शांतिपूर्ण भागीदारी से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और नागरिक—सभी राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखें। चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन राष्ट्र का विकास निरंतर चलता रहना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, विज्ञान, पर्यावरण, रोजगार, महिला सशक्तिकरण और आधारभूत संरचना जैसे विषय राष्ट्रीय प्राथमिकता बनने चाहिए।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। भाषा, संस्कृति, धर्म और परंपराओं की विविधता के बीच हमारी एकता ही हमारी पहचान है। इसलिए किसी भी प्रकार का सामाजिक विभाजन, वैमनस्य या कटुता देश की प्रगति में बाधक बनती है। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ हर नागरिक को सम्मान मिले, हर युवा को अवसर मिले और हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहे।
यदि हम विकसित भारत का सपना सच करना चाहते हैं, तो हमें व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना होगा। प्रतिभा का सम्मान, समान अवसर, न्यायपूर्ण व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक समरसता, शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संवाद और विकासोन्मुखी सोच—ये सभी मिलकर उस भारत की नींव रखेंगे जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें जहाँ विकास राजनीति से ऊपर, राष्ट्रहित व्यक्तिगत हितों से ऊपर और मानवता हर प्रकार के भेदभाव से ऊपर हो। यही विकसित, समृद्ध, न्यायपूर्ण और आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक पहचान होगी।




