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August 18, 2026

शोध से समाज तक: शोध संस्कृति, एआई और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान की नई दिशाओं पर मंथन

News Deskby News Desk
in उत्तराखंड, शिक्षा
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शोध से समाज तक: शोध संस्कृति, एआई और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान की नई दिशाओं पर मंथन
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हल्द्वानी, 18 अगस्त 2026। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के निदेशालय शोध एवं नवाचार की ओर से पीएच.डी. शोधार्थियों की छमाही प्रगति समीक्षा के लिए आयोजित दो दिवसीय शोध कार्यशाला का प्रथम दिन शोध संस्कृति, सामाजिक विज्ञान अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक रणनीति और शोध की सामाजिक उपयोगिता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर मंथन के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यशाला का आयोजन 18 एवं 19 अगस्त को विश्वविद्यालय के सीडीएस जनरल बिपिन रावत बहुउद्देशीय सभागार में किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं विश्वविद्यालय के कुलगीत के साथ हुआ। निदेशक, शोध प्रो. गिरिजा प्रसाद पाण्डे ने स्वागत संबोधन में कहा कि पूरी दुनिया में रिसर्च एवं डेवलपमेंट को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। उन्होंने शोधार्थियों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग केवल कॉपी-पेस्ट तक सीमित न रखने, बल्कि शोध की गुणवत्ता एवं मौलिकता बढ़ाने के लिए करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शोध में लगाए गए चार-पांच वर्षों का लाभ राज्य, राष्ट्र और वैश्विक समुदाय तक पहुंचना चाहिए।

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार के पूर्व कुलपति एवं चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. संजीव शर्मा ने “Emerging Dimensions of Social Science Research” विषय पर व्याख्यान देते हुए शोध के महत्व और जिम्मेदारी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हम अपने जीवन के 10 सेकंड भी किसी अनचाही कॉल को नहीं देते, जबकि शोध को पांच वर्ष देते हैं। इसलिए शोधार्थियों को अपने शोध के महत्व और उद्देश्य को गंभीरता से समझना होगा। उन्होंने कहा कि करोड़ों लोगों में से कोई एक व्यक्ति पीएच.डी. तक पहुंचता है और यह उपलब्धि अपने साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आती है।

उद्यमी, अभिनेता एवं समाजसेवी श्री द्वारिका प्रसाद रतूड़ी ने “Cross-Cultural Entrepreneurship and Global Strategy” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि फिल्म सेट हो या बिजनेस बोर्ड रूम, राष्ट्रीयता से अधिक महत्व प्रोफेशनलिज्म का होता है। समय की पाबंदी, तैयारी, अनुशासन और टीम के प्रति सम्मान ही व्यक्ति की वास्तविक पहचान बनाते हैं। उन्होंने शोधार्थियों से बड़े सपने देखने, विभिन्न संस्कृतियों से सीखने और अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का आह्वान किया।

कार्यशाला के अध्यक्ष एवं उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करना चाहिए। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि शिक्षार्थियों से उनके अध्ययन के बाद भी निरंतर जुड़ाव बना रहे। उन्होंने शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक बनाने पर जोर देते हुए कहा कि शोध के परिणाम जब जमीनी स्तर पर दिखाई देते हैं, तभी उसकी सार्थकता और बेहतर परिणाम सामने आते हैं।

उद्घाटन सत्र के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के बाद राष्ट्रगान हुआ।

कार्यशाला के प्रथम दिन के दूसरे प्रमुख चरण में विश्वविद्यालय के विभिन्न विषयों के पीएच.डी. शोधार्थियों की छमाही प्रगति प्रस्तुतियां आयोजित की गईं। शोधार्थियों ने अपने शोध कार्य की अब तक की प्रगति विशेषज्ञों एवं समीक्षा समिति के समक्ष प्रस्तुत की तथा उनके द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए। कार्यशाला के दूसरे दिन भी शोधार्थियों की प्रगति समीक्षा एवं शोध से जुड़े विभिन्न विषयों पर अकादमिक विमर्श जारी रहेगा।

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