लोहाघाट/हल्द्वानी/पिथौरागढ़। पंचायत चुनावों की तपिश भले ही स्थानीय हो, लेकिन इसके भीतर संघर्ष, रिश्तों की टकराहट और जज्बे की गूंज किसी भी बड़े चुनाव से कम नहीं रही। इस बार उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों की धरती कई अनोखी चुनावी कहानियों की गवाह बनी। कहीं भाई भाई के आमने-सामने आया, तो कहीं 22 साल के हौसले ने हार को हराया।
जब भाई बना प्रतिद्वंद्वी: दिलीप सिंह ने सगे छोटे भाई को दी मात
लोहाघाट विकासखंड की ग्राम पंचायत मौड़ा में ग्राम प्रधान पद के लिए हुए चुनाव में अनूठा मुकाबला देखने को मिला। यहां दो सगे भाई आमने-सामने थे। पूर्व फौजी दिलीप सिंह और उनके छोटे भाई मोहन सिंह दोनों मैदान में थे। मुकाबला कांटे का रहा लेकिन अंत में दिलीप सिंह ने अपने छोटे भाई को 30 वोटों से हराकर जीत दर्ज की। दिलीप को 144 वोट मिले, जबकि मोहन को 114।
दिलीप सिंह ने जीत के बाद कहा, “यह चुनाव मेरे लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन रहा। माँ का वोट किसे मिला, यह सवाल भी उठा, लेकिन मैंने कभी किसी पर दबाव नहीं बनाया।”
दो बार विधायक चुनाव हारे, अब जीता जनसेवा का विश्वास
लोहाघाट विधानसभा सीट से दो बार हारने के बाद भी प्रकाश सिंह धामी ने हार नहीं मानी। इस बार उन्होंने विकासखंड की जाख जिंडी बीडीसी सीट से चुनाव लड़ा और अपने प्रतिद्वंद्वी देवकी नंदन को 119 मतों से हराया। प्रकाश को 182, देवकी नंदन को 63, जबकि अन्य दो उम्मीदवारों को मात्र 29-29 वोट मिले।
प्रकाश सिंह बोले, “मैं हमेशा जनता की सेवा में तत्पर रहा हूं। विधायक पद की हार ने मुझे नहीं तोड़ा, बल्कि जनता के और करीब ला दिया। बीडीसी के रूप में क्षेत्रीय विकास की दिशा में काम करूंगा।”
22 साल की प्रतीक्षा, पांचवीं बार में मिला ग्राम प्रधान बनने का सपना
पिथौरागढ़ जिले के डीडीहाट ब्लॉक के कन्याल गांव में रहने वाले भूपाल राम की कहानी साहस और अडिग विश्वास की मिसाल बन गई है। वर्ष 2003 से लगातार चार चुनाव हारने के बाद भूपाल ने कभी हार नहीं मानी। इस बार पाँचवें प्रयास में वह जीत गए। उन्हें 252 वोट मिले, जबकि निकटतम प्रतिद्वंद्वी दिनेश कुमार को 225 और मुन्नी देवी को केवल 19 वोट ही मिले।
भूपाल कहते हैं, “एक वक्त ऐसा आया जब मैं पूरी तरह टूट गया था। लेकिन फिर मैंने खुद से वादा किया कि जब तक प्रधान नहीं बनूंगा, तब तक मैदान नहीं छोड़ूंगा।”
निष्कर्ष:
उत्तराखंड की इन पंचायतों में केवल वोट नहीं पड़े, बल्कि रिश्ते, आत्मबल, हार और उम्मीदें भी दांव पर लगी थीं। इन तीन कहानियों में एक ओर जहाँ भाई-भाई के बीच लोकतंत्र की टक्कर दिखी, वहीं दूसरी ओर वर्षों की साधना और जनसेवा का जुनून जीतकर बाहर आया।
यह सिर्फ चुनाव नहीं थे — यह आत्मबल, समर्पण और लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा थी, जिसे इन विजेताओं ने अपने तरीके से पास किया।

