अल्मोड़ा यहां स्थित मकड़ी में महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में प्राचीन समय से चली आ रही गौरा महेश्वर की पूजा अर्चना की पूजा का कार्य पुरोहित पंडित डॉक्टर मदन मोहन पाठक ने संपन्न कराया महिलाओं ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ भगवान गोरा महेश्वर का पूजन किया एवं उनका षोडशोपचार पूजन किया डोर की प्रतिष्ठा की और भगवान को विविध प्रकार के भोग लगाएं एवं पत्र पुष्प फल जल सुपारी और प्रसाद उन्हें अर्पित किया सभी ने अपने मंगलमय जीवन की कामना की यजमान प्रयाग दत्त जोशी जो कि सदैव इस कार्यक्रम का आयोजन अपने घर पर कराते हैं उनकी धर्मपत्नी सहित क्षेत्रीय महिलाओं ने गौरा महेश्वर की पूजा बहुत ही श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया महिलाओं ने डोर धारण की और पुरानी डोर का विसर्जन किया गोरा महेश्वर का पूजन कुमाऊं में काफी प्राचीन समय से मनाया जाता है गौरा महेश्वर को लोग अपने घरों में दो-चार दिन तक रखते हैं और नियमित वहां पर सांय काल को संध्या के समय से भजन इत्यादि आयोजित की जाते हैं और एक बेटी की तरह माता पार्वती को माना जाता है और जब विदा होती हैं तो उन्हें सम्मान से विदा किया जाता है और फिर अगले वर्ष आने का उनको निमंत्रण दिया जाता है तो इसी क्रम में कल दुर्गाष्टमी यानी आठों की पूजा होगी उसके एक-दो दिन के बाद फिर गौरा महेश्वर को भेज दिया जाएगा हमारी प्राचीन परंपराओं में इस परंपरा का अत्यंत महत्व है इसे खासतौर पर पिथौरागढ़ बागेश्वर अल्मोड़ा सहित काफी क्षेत्रों में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है हमारे नए बच्चों में इससे एक संदेश जाता है कि हमारी प्राचीन परंपराएं प्राचीन प्रथा है क्या रही थी और उसका क्या अर्थ था भगवान शिव और पार्वती को ऋतु फल चढ़ाना नए अनाज को चढ़ाना ऋतु फल को चढ़ाना बहुत ही अच्छा माना जाता था मक्के तोरई पीनालू के गाबे सहित दाड़िम अखरोट चढाया जाता है फिर जब माता का भी विसर्जन होता है तो उस दिन बच्चे लोग इन फलों को एक कपड़े में चादर वगैरह में रखकर उछलते हैं और तीन बार उछलने के बाद उन फलों को जमीन में गिराया जाता है तो सब लोग उस पर झपट पड़ते हैं जिसके हाथ जो भी फल आए वह उस फल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और जिसके हाथ में यह फल आए उसके लिए शुभ संकेत माना जाता है कुछ लोग चाचरी इत्यादि का भी गायन वहां पर करते हैं कुछ लोग भजन गा लेते हैं तो यह एक बहुत ही सुंदर प्रथा हमारे क्षेत्र में मनाई जाती है।






