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June 7, 2026

मोबाइल की चमक में धुंधलाते रिश्ते : सिमटता परिवार, बदलता समाज — मदन मोहन पाठक 

News Deskby News Desk
in उत्तराखंड, शिक्षा
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मोबाइल की चमक में धुंधलाते रिश्ते : सिमटता परिवार, बदलता समाज — मदन मोहन पाठक

“व्यापक दृष्टिकोण समाप्त प्रायः हो गया, सिमट रहे हैं रिश्ते, कसर पूरी कर दी मोबाइल ने।”

यह पंक्ति केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक यथार्थ का सटीक चित्रण है। तकनीक ने मानव जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही उसने मानवीय संबंधों की प्रकृति को भी बदल दिया है। आज परिवार एक ही छत के नीचे रहता है, लेकिन मानसिक और भावनात्मक दूरी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई है।

रिश्तों का बदलता स्वरूप

भारतीय समाज की पहचान सदैव संयुक्त परिवार, पारस्परिक सहयोग और गहरे आत्मीय संबंधों से रही है। दादा-दादी की कहानियाँ, परिवार के साथ बैठकर भोजन करना, सुख-दुःख में एक-दूसरे का साथ देना और बिना किसी स्वार्थ के रिश्तों को निभाना हमारी संस्कृति का हिस्सा था। लेकिन आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल क्रांति ने इस व्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित किया है।

आज अधिकांश संवाद आमने-सामने होने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर होने लगे हैं। परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठकर भी एक-दूसरे से बातचीत करने के बजाय सोशल मीडिया, वीडियो और चैट में व्यस्त रहते हैं। परिणामस्वरूप संवाद कम हुआ है और संवादहीनता बढ़ी है।

मोबाइल : सुविधा भी, चुनौती भी

मोबाइल फोन आधुनिक जीवन की आवश्यकता बन चुका है। शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, सूचना और आपातकालीन सेवाओं में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। समस्या मोबाइल के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग में है।

वर्तमान स्थिति यह है कि—

भोजन के समय भी मोबाइल साथ रहता है।

पारिवारिक बैठकों में बातचीत से अधिक स्क्रीन पर ध्यान रहता है।

बच्चों का बचपन डिजिटल दुनिया में सीमित होता जा रहा है।

बुजुर्ग परिवार में होते हुए भी उपेक्षा का अनुभव कर रहे हैं।

रिश्तों की गहराई “ऑनलाइन स्टेटस” और “लाइक” तक सीमित होती जा रही है।

विडंबना यह है कि दुनिया से जुड़ने वाला यह उपकरण कई बार अपने ही घर के लोगों से दूरी बढ़ा देता है।

व्यापक दृष्टिकोण क्यों सिमट रहा है?

रिश्तों के कमजोर होने का कारण केवल मोबाइल नहीं है। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण भी हैं—

1. अत्यधिक व्यक्तिवाद

आज “मैं” की भावना “हम” पर भारी पड़ रही है। व्यक्तिगत सफलता और सुविधाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

2. व्यस्त जीवनशैली

नौकरी, व्यवसाय और प्रतिस्पर्धा के दबाव ने परिवार के लिए समय कम कर दिया है।

3. संयुक्त परिवारों का विघटन

संयुक्त परिवारों के टूटने से अनुभव, संस्कार और सामूहिकता की परंपरा कमजोर हुई है।

4. डिजिटल निर्भरता

मनोरंजन, जानकारी और सामाजिक संपर्क के लिए तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ी है।

5. सहनशीलता में कमी

रिश्ते त्याग, धैर्य और समझौते पर टिके होते हैं, जबकि आधुनिक जीवन त्वरित संतुष्टि की अपेक्षा बढ़ा रहा है।

समाज पर पड़ने वाले प्रभाव

जब परिवार कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव केवल घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है।

अकेलेपन और मानसिक तनाव में वृद्धि होती है।

बुजुर्गों की उपेक्षा बढ़ती है।

बच्चों के संस्कार और सामाजिक विकास प्रभावित होते हैं।

पारिवारिक विवाद और टूटन की घटनाएँ बढ़ती हैं।

समाज में संवेदनशीलता और सहयोग की भावना कमजोर होती है।

एक मजबूत समाज की नींव मजबूत परिवार होते हैं। यदि परिवारों में आत्मीयता कम होगी तो सामाजिक ताना-बाना भी कमजोर होगा।

समाधान क्या है?

तकनीक का विरोध समाधान नहीं है। आवश्यकता संतुलन की है।

परिवार में प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल-मुक्त संवाद के लिए निर्धारित किया जाए।

भोजन के समय मोबाइल का उपयोग न किया जाए।

बच्चों और बुजुर्गों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताया जाए।

पारिवारिक कार्यक्रमों और सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जाए।

डिजिटल दुनिया से अधिक वास्तविक संबंधों को महत्व दिया जाए।

रिश्ते किसी एप्लीकेशन की तरह डाउनलोड नहीं किए जा सकते। उन्हें समय, विश्वास, संवेदना और समर्पण से बनाया और निभाया जाता है।

निष्कर्ष

तकनीक मानव जीवन की सहायक है, उसका विकल्प नहीं। मोबाइल ने सुविधाएँ दी हैं, लेकिन यदि उसका उपयोग विवेकपूर्ण न हो तो वह रिश्तों के बीच अदृश्य दीवार भी खड़ी कर सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम डिजिटल प्रगति और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन स्थापित करें।

याद रखना चाहिए कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर किसी व्यक्ति को मोबाइल की स्क्रीन नहीं, बल्कि अपने लोगों का साथ, उनका स्नेह और आत्मीयता ही सबसे अधिक सुकून देती है। यदि रिश्ते मजबूत हैं तो परिवार मजबूत है, और यदि परिवार मजबूत है तो समाज तथा राष्ट्र भी मजबूत रहेगा।

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