कलम का धर्म : मैं आखिर क्यों लिखता हूँ
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ,
समाज का आईना क्यों रखता हूँ।
इसमें मेरा क्या स्वार्थ निहित है,
क्यों मैं औरों की बात करता हूँ?
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
शायद इक बदलाव की आस में लिखता हूँ,
बदलते परिदृश्य में स्वयं को रखता हूँ।
कभी दिल से, कभी दिमाग से,
सच को अनेक कसौटियों पर परखता हूँ।
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
मैं कलम का सिपाही बनने की चाह में लिखता हूँ,
नित्य मर्दित होती आवाज़ों का प्रतिकार करता हूँ।
मैं नहीं करूँ तो और कौन करेगा,
इसी संकल्प की अग्नि में स्वयं तपता हूँ।
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
मैं युवा दिलों का साज़ भी लिखता हूँ,
और परिवर्तन का संदेश भी देता हूँ।
किसी का दमन मुझे स्वीकार नहीं,
व्यक्ति नहीं, पूरे समाज की बात करता हूँ।
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
आत्मसंतुष्टि के लिए भी लिखता हूँ,
सबका सम्मान हो, ऐसा प्रयास करता हूँ।
वरना कौन किसका है इस भौतिक जग में,
मैं समरसता और सद्भाव का प्रयास करता हूँ।
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
शोषण और अन्याय के विरुद्ध लिखता हूँ,
पालनहार से प्रश्न करने का साहस भी रखता हूँ।
हूँ तो एक छोटा-सा सिपाही मैं,
पर दुनिया बदलने की ताकत अपनी कलम में रखता हूँ।
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
कलम केवल शब्दों का व्यापार नहीं,
यह चेतना का उजियारा है।
पत्रकार और कवि का धर्म यही,
जन-जन का बनना सहारा है।
सत्य, न्याय और मानवता की राह में,
मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ।
इसी विश्वास, इसी संकल्प के साथ—
मैं आखिर क्यों लिखता हूँ।।
✍️ सौरभ गिरी
(कलमकार, समाज और सत्य के पक्षधर)





