हल्द्वानी। उत्तराखण्ड की समृद्ध जैव विविधता, औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. डॉ. बी.एस. कालाकोटी एवं डॉ. गरिमा मटेला की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘Glossary of Commercial Herbs of Uttarakhand’ का विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति, मुख्य अतिथि डॉ. तेजस्वनी अरविन्द पाटील, चीफ कुमायूं वन विभाग तथा विशेष अतिथि डॉ. प्रदीप कुमार जोशी, चेयरमैन राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा किया गया।
पुस्तक को उत्तराखण्ड की प्राकृतिक संपदा, जैव विविधता संरक्षण तथा औषधीय पादपों के वैज्ञानिक उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति माना जा रहा है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि प्रदेश की बहुमूल्य वनस्पति संपदा के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, संरक्षण, संवर्धन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में सार्थक पहल है।
उत्तराखण्ड प्राकृतिक रूप से औषधीय एवं सुगंधित पौधों का समृद्ध भंडार है। प्रदेश में पाई जाने वाली अनेक जड़ी-बूटियों का उपयोग औषधि, आयुर्वेद, न्यूट्रिशन, खाद्य एवं हर्बल उद्योगों में व्यापक रूप से किया जाता है। यदि इन बहुमूल्य वनस्पतियों का वैज्ञानिक ढंग से कृषिकरण और व्यावसायिक उत्पादन किया जाए तो प्रदेश में रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोकने में भी महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।
औषधीय एवं सुगंधित वनस्पतियों के व्यावसायिक उत्पादन को बढ़ावा देकर उत्तराखण्ड की जड़ी-बूटियों को देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इससे प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलने की संभावनाएं हैं।
पुस्तक में उत्तराखण्ड की व्यावसायिक औषधीय वनस्पतियों की पहचान, उपयोगिता, वैज्ञानिक विशेषताओं तथा उनके संभावित व्यावसायिक महत्व को सरल एवं व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि यह पुस्तक वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, वनस्पति विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों, रसायनविदों, आयुर्वेद विशेषज्ञों, फार्माकोलॉजिस्ट तथा औषधीय एवं हर्बल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री साबित हो सकती है।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखण्ड की वनस्पति संपदा केवल प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक समृद्धि का महत्वपूर्ण आधार भी बन सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ते हुए औषधीय पौधों के संरक्षण, संवर्धन और व्यावसायिक उत्पादन के लिए प्रभावी रणनीति तैयार की जाए।
डॉ. बी.एस. कालाकोटी एवं डॉ. गरिमा मटेला ने इस कृति के माध्यम से उत्तराखण्ड की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और सतत विकास की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी यह पहल शोध, शिक्षा, वनस्पति संरक्षण और औषधीय उद्योग के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करने वाली है।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. ललित तिवारी, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान विभाग, नैनीताल ने किया। इस अवसर पर डॉ. हरीश जोशी, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विभाग, उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी द्वारा पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के साथ वृक्षारोपण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में लगभग 50 शिक्षाविदों एवं विद्वानों ने प्रतिभाग किया।
पुस्तक के लेखक डॉ. बी.एस. कालाकोटी एवं डॉ. गरिमा मटेला को इस महत्वपूर्ण एवं उपयोगी कृति के लिए शिक्षाविदों और उपस्थित अतिथियों ने हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।




