लेखक मदन मोहन पाठक
मानव जीवन में सफलता का प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही महत्वपूर्ण भी है। प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, प्रतिष्ठा और उपलब्धि प्राप्त करना चाहता है, किंतु सभी को समान सफलता नहीं मिलती। इसका प्रमुख कारण यह है कि कुछ लोग कर्म, परिश्रम और धैर्य का मार्ग चुनते हैं, जबकि कुछ लोग आलस्य, अकर्मण्यता, चालाकी और चाटुकारिता के सहारे आगे बढ़ने का भ्रम पाल लेते हैं।
इतिहास, समाज और जीवन का अनुभव इस बात का साक्षी है कि कर्महीन व्यक्ति कुछ समय के लिए भले ही अवसर प्राप्त कर ले, लेकिन स्थायी सफलता कभी हासिल नहीं कर सकता। दूसरी ओर, शांत, सौम्य, परिश्रमी और ईमानदार व्यक्ति देर से ही सही, किंतु अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर निश्चित रूप से सफलता प्राप्त करता है।
कर्महीनता: पतन की पहली सीढ़ी
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। भारतीय संस्कृति में कहा गया है—
“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।”
अर्थात, आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है।
जो व्यक्ति कार्य करने से बचता है, जिम्मेदारियों से भागता है और हर काम को टालता रहता है, वह धीरे-धीरे अपनी क्षमता खो देता है। ऐसे लोग परिस्थितियों को दोष देते हैं, भाग्य को कोसते हैं और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं, जबकि वास्तविकता यह होती है कि उन्होंने स्वयं कभी निरंतर प्रयास ही नहीं किया।
चालाकी और चाटुकारिता का सीमित प्रभाव
समाज में कुछ लोग अपनी योग्यता के बजाय चाटुकारिता को साधन बना लेते हैं। वे सत्य और सिद्धांतों की बजाय व्यक्तियों की प्रशंसा कर लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग अक्सर यह मान बैठते हैं कि चापलूसी ही सफलता की कुंजी है।
लेकिन इतिहास बताता है कि चाटुकारिता से पद तो मिल सकता है, सम्मान नहीं; अवसर तो मिल सकता है, विश्वास नहीं।
प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने लिखा था—
“सम्मान की प्राप्ति परिश्रम और चरित्र से होती है, चापलूसी से नहीं।”
चालाक व्यक्ति कुछ समय तक लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन सत्य अधिक समय तक छिपा नहीं रहता। जब योग्यता की परीक्षा होती है, तब केवल वास्तविक क्षमता ही काम आती है।
असफलताओं का दोष दूसरों पर डालना: दोषारोपण की प्रवृत्ति
कर्महीन, आलसी और अकर्मण्य लोगों की एक और विशेषता होती है कि वे अपनी असफलताओं का आत्ममंथन नहीं करते। वे अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय हर विफलता का दोष किसी न किसी अन्य व्यक्ति, परिस्थिति या भाग्य पर मढ़ देते हैं। ऐसे लोग आत्मनिरीक्षण से बचते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करते हैं।
मनोविज्ञान की भाषा में इसे “दोषारोपण प्रवृत्ति” कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं की गलतियों से सीखने के बजाय परिस्थितियों का बहाना बनाते हैं। जबकि, जो व्यक्ति अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार करता है, वही सुधार और सफलता की दिशा में आगे बढ़ता है।
महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन ने हजारों असफल प्रयोगों के बाद भी कभी किसी और को दोष नहीं दिया। उन्होंने अपनी असफलताओं को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना और अंततः सफलता प्राप्त की।
सच्चाई यह है कि असफलता का दोष दूसरों पर डालने वाले व्यक्ति को बहानाबाज़, उत्तरदायित्व-विमुख और आत्मप्रवंचक कहा जा सकता है। ऐसे लोग परिस्थितियों को बदलने के बजाय बहानों का निर्माण करते हैं। वे अपनी कमियों को स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते और जीवन भर दूसरों की गलतियाँ गिनाने में ही व्यस्त रहते हैं। परिणामस्वरूप उनका व्यक्तित्व विकास रुक जाता है और वे सफलता के वास्तविक मार्ग से भटक जाते हैं।
इसके विपरीत कर्मयोगी व्यक्ति अपनी कमजोरियों को पहचानता है, आत्ममंथन करता है और निरंतर स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। वह जानता है कि जीवन में मिली प्रत्येक असफलता एक सीख है, न कि किसी और पर आरोप लगाने का अवसर। यही कारण है कि जिम्मेदारी स्वीकार करने वाले लोग अंततः सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं, जबकि दोषारोपण करने वाले लोग शिकायतों और निराशाओं के दायरे में ही सीमित रह जाते हैं।
सफलता का वास्तविक आधार: श्रम और अनुशासन
दुनिया के सभी महान व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करें तो एक बात समान रूप से दिखाई देती है—निरंतर परिश्रम।
महात्मा गांधी ने सत्य और अथक परिश्रम के बल पर असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव बनाया। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साधारण परिवार से निकलकर अपनी मेहनत, विनम्रता और ज्ञान के कारण देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचे।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को संदेश दिया था—
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”
इन महापुरुषों की सफलता का आधार न तो चाटुकारिता थी और न ही छल-कपट, बल्कि कठोर श्रम, आत्मविश्वास और कर्मनिष्ठा थी।
शांत और सौम्य व्यक्ति क्यों सफल होते हैं?
समाज में अक्सर देखा जाता है कि जो व्यक्ति शांत, विनम्र और सौम्य होता है, उसे कुछ लोग कमजोर समझ लेते हैं। लेकिन वास्तव में यही लोग अपनी ऊर्जा को विवादों में नहीं, बल्कि सृजन में लगाते हैं।
शांत व्यक्ति निर्णय सोच-समझकर लेता है। सौम्य व्यक्ति संबंधों को जोड़ता है। मेहनती व्यक्ति निरंतर सीखता रहता है। इन तीनों गुणों का मेल व्यक्ति को दीर्घकालिक सफलता प्रदान करता है।
फलदार वृक्ष कभी शोर नहीं करते। नदियाँ कल-कल बहती हैं, लेकिन अपना मार्ग स्वयं बनाती हैं। उसी प्रकार कर्मशील व्यक्ति बिना अनावश्यक प्रचार के अपने कार्यों से पहचान बनाता है।
प्रकृति का अटल नियम
प्रकृति का नियम स्पष्ट है—जो बोओगे, वही काटोगे।
किसान खेत में बीज बोए बिना फसल की अपेक्षा नहीं कर सकता। विद्यार्थी पढ़ाई किए बिना अच्छे अंक नहीं ला सकता। खिलाड़ी अभ्यास किए बिना पदक नहीं जीत सकता। उसी प्रकार जीवन में बिना कर्म के सफलता की आशा करना स्वयं को धोखा देने के समान है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता करने में नहीं।
निष्कर्ष
कर्महीन, आलसी, अकर्मण्य, चाटुकार और सदैव दूसरों को दोष देने वाले लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि सफलता का वृक्ष केवल परिश्रम की भूमि में ही उगता है। छल, कपट, चाटुकारिता, अवसरवादिता और दोषारोपण कुछ समय के लिए लाभ दे सकते हैं, लेकिन स्थायी सम्मान और वास्तविक उपलब्धि नहीं।
सफलता अंततः उसी के चरण चूमती है जो शांत है, सौम्य है, निरंतर सीखता है, संघर्ष करता है, अपनी कमियों को स्वीकार करता है और ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता है।
आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि हम शॉर्टकट की संस्कृति से बाहर निकलें और कर्म, चरित्र, उत्तरदायित्व तथा परिश्रम को अपना जीवन-मंत्र बनाएं। क्योंकि इतिहास गवाह है कि तात्कालिक लाभ पाने वाले लोग भुला दिए जाते हैं, जबकि कर्मयोगी पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं।
“परिश्रम वह चाबी है, जो भाग्य के बंद दरवाजों को भी खोल देती है।”
और यह भी उतना ही सत्य है कि—
“जो व्यक्ति अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार कर लेता है, वही अपने जीवन की सफलताओं का वास्तविक निर्माता बनता है।”





