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October 10, 2026

11/10/2026 से शुरू होंगी नवरात्रि आइए जानते हैं कलश स्थापना मुहूर्त एवं नवरात्रि पर विशेष

News Deskby News Desk
in उत्तराखंड, ज्योतिष, देश, धार्मिक, शिक्षा
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11/10/2026 से शुरू होंगी नवरात्रि आइए जानते हैं कलश स्थापना मुहूर्त एवं नवरात्रि पर विशेष
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लेखक: वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित डॉ. मदन मोहन पाठक
अल्मोड़ा/हल्द्वानी। सनातन धर्म में शारदीय नवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना, आत्मशुद्धि, साधना और आध्यात्मिक जागरण का महापर्व है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाले इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। घर-घर में कलश स्थापना, अखंड दीप प्रज्वलन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप और व्रत के माध्यम से श्रद्धालु मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।
इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को होगा, जबकि मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ नौ दिवसीय पर्व का समापन होगा। नवरात्रि के प्रथम दिन होने वाली कलश स्थापना को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान और श्रद्धापूर्वक की गई घटस्थापना से घर में आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है तथा साधक नौ दिनों तक देवी उपासना का संकल्प लेकर अपनी साधना आरंभ करता है।
कलश स्थापना के लिए सुबह 10:04 से दोपहर 12:30 बजे तक का समय
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित डॉ. मदन मोहन पाठक के अनुसार, उपलब्ध ज्योतिषीय गणना के आधार पर 11 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए सुबह 10 बजकर 04 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। नवरात्रि के प्रारंभ में चित्रा नक्षत्र, वैधृति योग और चंद्रमा की स्थिति को ध्यान में रखते हुए पूजा-अर्चना के समय का निर्धारण किया जाता है।
हालांकि, कलश स्थापना के मुहूर्त में स्थानीय सूर्योदय, तिथि, नक्षत्र और पंचांग संबंधी गणनाओं का विशेष महत्व होता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग और स्थानीय समय के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए।
कलश स्थापना को नवरात्रि की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में स्थान प्राप्त है। इसे घटस्थापना भी कहा जाता है। कलश को शुभता, समृद्धि और मांगलिक ऊर्जा का प्रतीक मानते हुए देवी का आह्वान किया जाता है। इसके साथ ही घरों और मंदिरों में नौ दिनों तक चलने वाली पूजा-अर्चना का शुभारंभ होता है।
चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में देवी आराधना का विशेष महत्व
ज्योतिषीय परंपरा में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग और चंद्रमा की स्थिति का विचार किया जाता है। नवरात्रि जैसे प्रमुख पर्व पर इन पंचांग संबंधी तत्वों का महत्व और बढ़ जाता है।
चित्रा नक्षत्र को परंपरागत ज्योतिष में रचनात्मकता, सौंदर्य और निर्माण से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, वैधृति योग के संबंध में भी शास्त्रीय पंचांगों में विशेष विचार किया जाता है। इसलिए इस दिन घटस्थापना करते समय केवल नक्षत्र अथवा योग के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय संपूर्ण पंचांग और निर्धारित मुहूर्त को ध्यान में रखना चाहिए।
नवरात्रि का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और जीवन में संयम तथा सदाचार अपनाने की प्रेरणा देता है।
इस विधि से करें कलश स्थापना
नवरात्रि के प्रथम दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई कर वहां चौकी स्थापित करें और उस पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
इसके बाद परंपरा के अनुसार मिट्टी के पात्र में जौ बोएं। पूजा सामग्री तैयार करने के बाद कलश में स्वच्छ जल भरें। उसमें सुपारी, अक्षत और सिक्का आदि रख सकते हैं। कलश के मुख पर आम के पत्ते अथवा अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पवित्र पत्ते लगाकर उसके ऊपर नारियल स्थापित करें।
कलश स्थापना के समय देवी का ध्यान करते हुए पूजा-अर्चना का संकल्प लें। इसके बाद दीपक प्रज्वलित कर मां दुर्गा की विधिवत पूजा करें। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा अथवा देवी स्तुति का पाठ कर सकते हैं।
यदि किसी व्यक्ति के लिए विस्तृत अनुष्ठान करना संभव न हो, तो वह भी श्रद्धापूर्वक मां भगवती का स्मरण और सरल मंत्र जाप कर सकता है।
मां दुर्गा का सरल मंत्र:
ॐ दुं दुर्गायै नमः।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा, एकाग्रता और सकारात्मक भाव से की गई उपासना मन को शांति प्रदान करती है। पूजा के साथ नियमित दिनचर्या, संयमित व्यवहार और दूसरों के प्रति सद्भाव बनाए रखना भी आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अंग है।
मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की होती है आराधना
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की परंपरा है। प्रथम दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है।
देवी के ये नौ स्वरूप शक्ति, तपस्या, साहस, करुणा, मातृत्व, निर्भयता और आध्यात्मिक सिद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं तथा घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन करते हैं।
अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की परंपरा भी प्रचलित है। इसमें कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन तथा उपहार अर्पित किए जाते हैं।
20 अक्टूबर को विजयादशमी, हवन के बाद होगा व्रत पारण
इस वर्ष मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। इसे दशहरा भी कहा जाता है। भारतीय धार्मिक परंपरा में विजयादशमी असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है।
नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार हवन, देवी पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने के बाद व्रत का पारण करते हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विजयादशमी के दिन दोपहर 12 बजकर 51 मिनट के बाद पारण का समय बताया गया है। हालांकि, इस समय की स्थानीय पंचांग से स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। श्रद्धालुओं को दशमी तिथि की स्थिति, स्थानीय पंचांग और अपने अनुष्ठान की परंपरा के अनुसार पारण का समय निर्धारित करना चाहिए।
विजयादशमी का धार्मिक महत्व केवल पर्व मनाने तक सीमित नहीं है। यह दिन मनुष्य को अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने की प्रेरणा भी देता है। इस अवसर पर हमें सत्य, न्याय, कर्तव्यनिष्ठा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।
मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान के वाहन से जुड़ी मान्यताएं
भारतीय धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि के प्रारंभ और समापन के वार के आधार पर मां दुर्गा के आगमन एवं प्रस्थान के वाहन से संबंधित मान्यताएं प्रचलित हैं। इन मान्यताओं का उल्लेख विभिन्न धार्मिक परंपराओं और पंचांगों में मिलता है।
परंपरागत मान्यता के अनुसार, रविवार को नवरात्रि का शुभारंभ होने पर मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जाता है। वहीं, मंगलवार को नवरात्रि का समापन होने पर देवी के प्रस्थान का वाहन मुर्ग बताया जाता है।
धार्मिक प्रतीकात्मक व्याख्याओं में हाथी को वर्षा, समृद्धि और वैभव से जोड़कर देखा जाता है। दूसरी ओर, मुर्ग पर देवी के प्रस्थान को कुछ परंपराओं में प्रतिकूल परिस्थितियों के संकेत के रूप में वर्णित किया गया है।
हालांकि, इन मान्यताओं को धार्मिक परंपरा और प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में ही समझना चाहिए। इनके आधार पर मौसम, सामाजिक परिस्थितियों अथवा भविष्य की घटनाओं के संबंध में निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
पूजा के साथ आत्मशुद्धि और नारी सम्मान का भी लें संकल्प
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित डॉ. मदन मोहन पाठक के अनुसार, शारदीय नवरात्रि आत्मचिंतन, आत्मानुशासन और सकारात्मक परिवर्तन का अवसर है। मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप हमें यह संदेश देते हैं कि जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना साहस, धैर्य, विवेक और दृढ़ इच्छाशक्ति से किया जा सकता है।
नवरात्रि में श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुरूप ही व्रत रखना चाहिए। मधुमेह, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं अथवा नियमित दवाओं का सेवन करने वाले लोगों को उपवास के संबंध में चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य की सुरक्षा भी आवश्यक है।
कन्या पूजन की परंपरा हमें नारी शक्ति के सम्मान का संदेश देती है। इस भावना को केवल अनुष्ठान तक सीमित न रखते हुए बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा, समान अधिकार और आत्मनिर्भरता के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मां भगवती की आराधना का वास्तविक उद्देश्य जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यदि हम पूजा के साथ अपने व्यवहार में प्रेम, वाणी में मधुरता, विचारों में पवित्रता और कर्मों में ईमानदारी को स्थान दें, तो नवरात्रि की साधना अधिक सार्थक बन सकती है।
श्रद्धा, शक्ति और सदाचार का पर्व है शारदीय नवरात्रि
शारदीय नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल सामर्थ्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि उसका उपयोग सत्य, न्याय और जनकल्याण के लिए करना भी है। मां दुर्गा की उपासना मनुष्य को भय और निराशा से उबरने, आत्मविश्वास विकसित करने तथा जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।
इस नवरात्रि श्रद्धालु विधि-विधान से कलश स्थापना करें, अपनी श्रद्धा के अनुसार मां भगवती की आराधना करें और परिवार में सुख, शांति तथा सद्भाव बनाए रखने का प्रयास करें। विजयादशमी के पावन अवसर पर बुराइयों का त्याग कर सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
मां दुर्गा सभी के जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य और सद्बुद्धि का संचार करें।
जय माता दी!
लेखक: वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित डॉ. मदन मोहन पाठक
ज्योतिषीय अनुभव: 33 वर्ष
संस्थान: श्री हरि ज्योतिष अनुसंधान योग एवं कर्मकांड संस्थान
कार्यक्षेत्र: अल्मोड़ा–हल्द्वानी, उत्तराखंड

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