लेखक: मदन मोहन पाठक
हिमालय की गोद में बसा पिथौरागढ़ केवल उत्तराखंड का एक सीमांत जनपद भर नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना, वीर परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों का जीवंत प्रतीक है। प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था, सामरिक महत्व और ऐतिहासिक वैभव से समृद्ध पिथौरागढ़ को ‘कुमाऊँ का छोटा कश्मीर’ और तिब्बत-नेपाल व्यापार का ऐतिहासिक प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। महाकाली, गोरी और रामगंगा नदियों की घाटी से घिरा यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही मध्य एशिया, तिब्बत और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच वाणिज्य, संस्कृति और सभ्यता के आदान-प्रदान का एक मुख्य सेतु रहा है।
प्राचीन इतिहास और पौराणिक महत्व
पिथौरागढ़ का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से जुड़ा है। क्षेत्र की लाखू उडियार और बनकोट से प्राप्त ताम्र मानव आकृतियां (Copper Anthropomorphs) यह सिद्ध करती हैं कि यह घाटी ताम्र-पाषाण काल से ही उन्नत मानव बस्तियों का केंद्र रही है।
पौराणिक ग्रंथों में इस क्षेत्र का अत्यधिक महत्व है। स्कंद पुराण के मानस खंड में इस पूरे क्षेत्र को ‘पावन भूमि’ कहा गया है, जिसमें यहाँ की पवित्र नदियों (सरयू, रामगंगा, काली) और किरातों, खसों जैसी प्राचीन जातियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) से होकर गुजरने वाला कैलास-मानसरोवर यात्रा मार्ग सदियों से आदि गुरु शंकराचार्य से लेकर आधुनिक काल के तीर्थयात्रियों की आस्था का पथ रहा है, जिसके कारण यह क्षेत्र प्राचीन काल से धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बना रहा।
8वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान यह क्षेत्र कत्यूरी (कार्तिकेयपुर) राजवंश के अधीन था। कत्यूरी शासन के अवसान के बाद यह क्षेत्र छोटी-छोटी गढ़ियों और ठकुराइयों में बंट गया, जिनमें अस्कोट के ‘पाल’ वंश और सोर घाटी के ‘बम’ राजा प्रमुख थे।
चंद राजवंश और नामकरण का प्रामाणिक इतिहास
14वीं-15वीं शताब्दी में अल्मोड़ा और चम्पावत के चंद राजवंश ने सोर घाटी (वर्तमान पिथौरागढ़) पर विजय प्राप्त की। 15वीं और 16वीं शताब्दी में चंद शासकों के अधीन पिथौरागढ़ ने उल्लेखनीय प्रगति की। चंद राजाओं ने यहाँ अनेक मंदिरों, किलों तथा सांस्कृतिक स्थलों का निर्माण कराया। उनके शासनकाल में यह क्षेत्र व्यापार, कृषि, संस्कृति और कला का प्रमुख केंद्र बन गया।
प्रसिद्ध इतिहासकार ई.टी. एटकिंसन (E.T. Atkinson) के ‘हिमालयन गजेटियर’ और स्थानीय साक्ष्यों के अनुसार, राजा भारती चंद के पुत्र रत्न चंद ने जब सोर घाटी के बम राजाओं को हराया, तब इस क्षेत्र को कुमाऊँ साम्राज्य में सुदृढ़ता से मिलाया गया।
इतिहासकारों के अनुसार, पिथौरागढ़ का नाम ‘पृथ्वीगढ़’ से विकसित हुआ माना जाता है। चंद वंश के राजा पृथ्वी चंद ने यहाँ सुरक्षा की दृष्टि से एक किले और चौकियों का निर्माण किया था, जिसके नाम पर इसे ‘पृथ्वीगढ़’ कहा गया, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर पिथौरागढ़ कहलाया। कुछ विद्वान इसका संबंध दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान की एक शाखा से भी जोड़ते हैं, जिन्होंने यहाँ ‘पिथौराजशाही’ किले का निर्माण कराया था। इन राजाओं के अवशेष आज भी उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं।
ऐतिहासिक धरोहरें और वास्तुकला
पिथौरागढ़ किला (लंदन फोर्ट)
पिथौरागढ़ किला इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान है। इस किले का निर्माण मूल रूप से चंद राजाओं के काल में हुआ था, लेकिन 1791 ई. में जब गोरखाओं ने आक्रमण किया, तो उन्होंने इसका पुनरुद्धार कर इसे एक अभेद्य सैन्य दुर्ग का रूप दिया। यह किला न केवल सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि प्रशासनिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र था। ब्रिटिश काल में, 1815 के बाद अंग्रेज़ों ने इसका नाम बदलकर ‘लंदन फोर्ट’ (London Fort) रख दिया। वर्तमान में यह किला इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
महाकाली पीठ, गंगोलीहाट (हाटकाली मंदिर)
गंगोलीहाट स्थित हाटकाली मंदिर कुमाऊँ की प्राचीन धार्मिक परंपराओं का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित और देवी महाकाली को समर्पित यह शक्तिपीठ सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। इस मंदिर का स्थापत्य नागर और कत्यूरी शैली का अनूठा मिश्रण है। भारतीय सेना की प्रसिद्ध ‘कुमाऊँ रेजिमेंट’ के सैनिक युद्ध पर जाने से पहले ‘हाट कालिका’ का जयघोष करते हैं, जो इसके विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है।
सोर घाटी के नाग मंदिर एवं अन्य प्राचीन धरोहरें
पिथौरागढ़ जनपद में अनेक प्राचीन शिव मंदिर और नाग मंदिर स्थित हैं, जो क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। पिथौरागढ़ को ‘नाग भूमि’ भी कहा जाता है। यहाँ स्थित बेरीनाग, धौलनाग, कालीनाग, फेनीनाग और वासुकीनाग मंदिर इस बात के प्रमाण हैं कि चंद और कत्यूरी शासकों से पहले यहाँ नाग वंश के मूल निवासियों का सांस्कृतिक वर्चस्व था। इन मंदिरों की वास्तुकला, शिल्पकला और ऐतिहासिक महत्व आज भी शोधकर्ताओं को आकर्षित करते हैं।
गोरखा शासन और ब्रिटिश काल
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध (1791 ई.) में गोरखाओं ने कुमाऊँ क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। लगभग पच्चीस वर्षों तक गोरखा शासन यहाँ कायम रहा, जिसे स्थानीय इतिहास में ‘गोरख्याणी’ (दमनकारी शासन) कहा जाता है। इसके पश्चात 1814-1816 के एंग्लो-नेपाल युद्ध के परिणामस्वरूप हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि (Treaty of Sugauli) के तहत कुमाऊँ सहित पिथौरागढ़ क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।
ब्रिटिश प्रशासन ने यहाँ सड़क, शिक्षा, डाक और प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की दिशा में कार्य किए। अंग्रेज़ों ने इसे अल्मोड़ा जिले की एक तहसील बनाया और तिब्बत व्यापार (ऊन, सुहागा, नमक) को बढ़ावा देने के लिए धारचूला और मुनस्यारी जैसे सीमांत क्षेत्रों को व्यापारिक मंडियों के रूप में विकसित किया। सीमांत क्षेत्र होने के कारण पिथौरागढ़ का सामरिक महत्व भी लगातार बढ़ता गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
पिथौरागढ़ के अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीमांत क्षेत्र होने के बावजूद यहाँ राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव व्यापक था। स्वतंत्रता सेनानी प्रयाग दत्त पंत को पिथौरागढ़ में राष्ट्रीय चेतना जगाने और गांधी जी के असहयोग आंदोलन को सीमांत क्षेत्र में स्थापित करने का मुख्य श्रेय जाता है।
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942) के दौरान सालाम और सोर क्रांति में यहाँ के युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सक्रिय भागीदारी निभाई तथा देशभक्ति की अलख जगाई। आज भी यहाँ के वीर सैनिकों का भारतीय सेना (विशेषकर कुमाऊँ और गढ़वाल रेजिमेंट) में देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च योगदान रहता है।
सांस्कृतिक विरासत और लोकजीवन
पिथौरागढ़ की संस्कृति कुमाऊँनी परंपराओं से ओत-प्रोत है, जिसमें तिब्बती (भोटिया), नेपाली और भारतीय संस्कृतियों का एक सुंदर समन्वय मिलता है। यहाँ की लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, मेले और त्योहार क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।
हिलजात्रा (Hilljatra): यह सोर घाटी का कृषि-आधारित पारंपरिक मुखौटा नृत्य-नाट्य है, जो मूल रूप से पश्चिमी नेपाल के ‘इंद्रजात्रा’ से प्रभावित माना जाता है। इसका मुख्य पात्र ‘लखिया भूत’ (शिव का गण) जनमानस की अगाध आस्था का केंद्र है।
जौलजीबी मेला (Jauljibi Fair): गोरी और काली नदी के पवित्र संगम पर लगने वाला यह मेला वर्ष 1914 में अस्कोट के पाल राजाओं द्वारा आधिकारिक रूप से शुरू किया गया था। यह भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान का सबसे बड़ा ऐतिहासिक मंच रहा है।
शौका संस्कृति: धारचूला और मुनस्यारी के ‘शौका’ (भोटिया) समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं, उनके पारंपरिक परिधान (रंगा) और कालीन उद्योग इस जनपद को वैश्विक पहचान दिलाते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरायणी तथा विभिन्न धार्मिक आयोजन यहाँ की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन
पिथौरागढ़ को अपनी अद्भुत सुंदरता के कारण “लिटिल कश्मीर” (छोटा कश्मीर) भी कहा जाता है। हिमालय की ऊँची बर्फ़ीली चोटियां, हरे-भरे मखमली बुग्याल (घास के मैदान), रमणीय घाटियां और कल-कल बहती नदियां इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को अद्वितीय बनाती हैं।
मुनस्यारी (पंचाचूली शिखर के लिए प्रसिद्ध), धारचूला, चौकोड़ी, अस्कोट, जौलजीबी और पवित्र ओम पर्वत जैसे पर्यटन स्थल देश-विदेश के पर्यटकों और पर्वतारोहियों को आकर्षित करते हैं। कैलास-मानसरोवर यात्रा मार्ग का प्रमुख केंद्र होने के कारण भी वैश्विक मानचित्र पर पिथौरागढ़ का विशेष और पवित्र स्थान है।
सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जनपद
24 फरवरी 1960 को अल्मोड़ा से अलग कर पिथौरागढ़ को एक स्वतंत्र जनपद का दर्जा दिया गया। नेपाल और चीन (तिब्बत) की सीमाओं से सटे होने के कारण पिथौरागढ़ राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।
त्रि-पक्षीय सीमा (Tri-junction) के निकट होने के कारण भारतीय थल सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) तथा अन्य सुरक्षा बलों की मुस्तैद गतिविधियों के चलते यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से देश की अग्रिम चौकी के रूप में एक प्रहरी की भूमिका निभाता है। दारमा, ब्यास और चौदांस घाटियां देश की सुरक्षा की पहली अभेद्य दीवार हैं।
निष्कर्ष
पिथौरागढ़ का इतिहास केवल राजाओं, किलों और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, आस्था, परंपरा, संघर्ष और विकास की एक सतत यात्रा का जीवंत दस्तावेज है। दुर्गम हिमालयी परिस्थितियों में पले-बढ़े समाज की जीवंतता, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक समन्वय का यह एक अनुपम महाकाव्य है। अपनी प्राचीन विरासत, प्राकृतिक संपदा और राष्ट्रीय महत्व के कारण पिथौरागढ़ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की एक अमूल्य धरोहर है।
वर्तमान समय में आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल माध्यमों, आधुनिक पुरातात्विक शोधों और धरोहर संरक्षण (Heritage Conservation) के द्वारा इसकी ऐतिहासिक विरासत का संवर्धन किया जाए और नई पीढ़ी को इसके गौरवशाली अतीत से परिचित कराया जाए, ताकि आने वाले समय में भी यह सीमांत प्रहरी क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रख सके।




