लेखक- मदन मोहन पाठक
नेल्सन मंडेला का यह विचार उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (UOU), हल्द्वानी के धरातलीय कार्यों पर अक्षरशः लागू होता है। ऐसे समय में जब पारंपरिक उच्च शिक्षा अपने सीमित संसाधनों, भौगोलिक बाधाओं और विवशताओं के कारण केवल एक निश्चित वर्ग तक सिमटी हुई थी, तब उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय ने शिक्षा को समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) तक पहुंचाने का भगीरथ प्रयास किया है।
स्थापना और वैधानिक सुदृढ़ता
31 अक्टूबर 2005 को उत्तराखंड विधानसभा के अधिनियम (संख्या 25/2005) के तहत स्थापित इस विश्वविद्यालय ने दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) के माध्यम से शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की अवधारणा को साकार किया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दूरस्थ शिक्षा ब्यूरो (DEB) से मान्यता प्राप्त यह संस्थान आज राज्य के उच्च शिक्षा सकल नामांकन अनुपात (GER) को बढ़ाने में रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है। यह केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि राज्य के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर महानगरों में कार्यरत कामकाजी पेशेवरों तक के लिए ज्ञान का एक सेतु है।
भौगोलिक चुनौतियों का तकनीकी समाधान
उत्तराखंड का विषम भौगोलिक स्वरूप (कठिन पर्वतीय रास्ते, आपदा संवेदनशीलता और छितरी हुई आबादी) सदैव शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा रहा है। पारंपरिक कॉलेजों की पहुंच जहां सीमित है, वहीं उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय ने पूरे राज्य में 8 क्षेत्रीय केंद्रों (देहरादून, रुड़की, पौड़ी, उत्तरकाशी, द्वाराहाट, पिथौरागढ़, बागेश्वर, हल्द्वानी) और 150 से अधिक अध्ययन केंद्रों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया है।
विश्वविद्यालय ने ‘आईसीटी’ (Information and Communication Technology) का बेहतरीन उपयोग करते हुए निम्नलिखित माध्यमों से शिक्षा को घर-घर पहुंचाया है:
स्व-अध्ययन सामग्री (SLM): सुगम और सरल भाषा में तैयार पाठ्य सामग्रियां जो शिक्षार्थी स्वयं पढ़ सकें।
डिजिटल प्लेटफॉर्म: ‘UOU Live’ ऑडियो-वीडियो काउंसिलिंग, यू-ट्यूब चैनल और ओपन एजुकेशनल रिसोर्सेज (OER) का एक समृद्ध भंडार।
सुलभ परीक्षा प्रणाली: छात्र के निकटतम केंद्र पर परीक्षा की सुविधा, जिससे पर्वतीय युवाओं का समय और पैसा दोनों बचता है।
समावेशी शिक्षा और ‘लाइफलॉन्ग लर्निंग’ (आजीवन शिक्षा)
इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी लचीली और समावेशी प्रवेश नीति है। यहाँ शिक्षा के लिए उम्र, समय या स्थान का कोई बंधन नहीं है। एक ही सत्र में जहाँ 18 वर्ष का युवा अपने करियर की नींव रख रहा होता है, वहीं 60 वर्ष के सेवानिवृत्त नागरिक, गृहणियां और सेना या अन्य सेवाओं में कार्यरत जवान अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा कर रहे होते हैं। यह व्यवस्था भारतीय संविधान के ‘शिक्षा के अधिकार’ और यूनेस्को के ‘आजीवन अधिगम’ (Lifelong Learning) के सिद्धांत को व्यावहारिक धरातल पर उतारती है।
महिला सशक्तिकरण और एनईपी-2020 का सार
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) ‘समानता’ (Equity) और ‘पहुंच’ (Access) पर विशेष बल देती है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में, जहाँ ग्रामीण महिलाओं पर घरेलू और कृषि कार्यों का अत्यधिक बोझ होता है, इस विश्वविद्यालय ने उनके आंगन को ही क्लासरूम बना दिया है। आंकड़ों के अनुसार, मुक्त विश्वविद्यालय में कुल नामांकित छात्रों में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत उत्साहजनक है। शिक्षा पाकर ये महिलाएं न केवल जागरूक हो रही हैं, बल्कि पंचायती राज संस्थाओं में नेतृत्व, स्थानीय स्वरोजगार (होमस्टे, मशरूम उत्पादन, हस्तशिल्प) और सरकारी नौकरियों में अपनी पहचान बना रही हैं।
डिग्री के साथ कौशल और आत्मनिर्भरता
यह विश्वविद्यालय केवल ‘डिग्री बांटने वाली मशीन’ नहीं है, बल्कि यह कौशल विकास (Skill Development) का केंद्र भी है। बदलते वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए विश्वविद्यालय ने पारंपरिक पाठ्यक्रमों के साथ-साथ रोजगारोन्मुखी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की एक बड़ी श्रृंखला तैयार की है:
योग और प्राकृतिक चिकित्सा: उत्तराखंड की ‘योग भूमि’ की छवि को वैश्विक स्तर पर रोजगार से जोड़ना।
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और साइबर सुरक्षा: डिजिटल इंडिया के दौर में युवाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना।
पर्यटन और आतिथ्य सत्कार (Hospitality): राज्य की आर्थिकी के मुख्य स्रोत (पर्यटन) के लिए कुशल जनशक्ति तैयार करना।
पत्रकारिता, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान: समाज को जागरूक और बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करना।
यह पहल सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘कौशल विकास’ के राष्ट्रीय संकल्पों को जमीनी मजबूती देती है।
संकट में सारथी: डिजिटल सुदृढ़ता
कोविड-19 महामारी के दौर में जब देश की पूरी शिक्षा प्रणाली अचानक ठहर गई थी, तब उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की ‘मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा प्रणाली’ (ODL) एक वरदान बनकर उभरी। ई-लर्निंग, वर्चुअल कक्षाओं और ऑनलाइन मूल्यांकन के माध्यम से विश्वविद्यालय ने साबित कर दिया कि तकनीक आधारित दूरस्थ शिक्षा ही भविष्य की वास्तविक आवश्यकता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय केवल ईंट-गारे से बनी एक इमारत या एक प्रशासनिक मुख्यालय नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पहाड़ों में ज्ञान का अलख जगाने वाला एक जीवंत सामाजिक आंदोलन है। इसने शिक्षा को उम्र, लिंग, वर्ग और भौगोलिक सीमाओं की बेड़ियों से मुक्त कर ‘जन-जन का विश्वविद्यालय’ होने के गौरव को चरितार्थ किया है।
शून्य से शिखर की ओर बढ़ते इस राज्य में, जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं पहुँचती, तब तक वास्तविक विकास अधूरा है। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय इसी सामाजिक न्याय और समान अवसर की क्रांति का सबसे सशक्त और प्रामाणिक संवाहक है।





