लेखक: डॉक्टर मदन मोहन पाठक
(वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक)
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इस बात का स्पष्ट और चिंताजनक संकेत दे रहा है कि दुनिया एक ऐसे आर्थिक और मानवीय संकट की ओर बढ़ रही है, जिससे कोई भी देश अछूता नहीं रहेगा। अमेरिका, ईरान और इजराइल के त्रिकोणीय सैन्य और राजनीतिक तनाव ने आज पूरी दुनिया को एक अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है। इस भू-राजनीतिक टकराव (Geopolitical Conflict) का सबसे पहला और सबसे क्रूर प्रहार किसी महल पर नहीं, बल्कि एक आम इंसान, गरीब और दिहाड़ी मजदूर की रसोई और उसकी जेब पर हो रहा है।
एशिया से लेकर यूरोप तक, आज ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, गैस की किल्लत से उद्योग ठप हो रहे हैं और आने वाले समय में एक भयावह आर्थिक मंदी तथा कमरतोड़ महंगाई (Stagflation) का खतरा साफ मंडरा रहा है।
1. ऊर्जा संकट: ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ की नाकेबंदी और थमता वैश्विक चक्का
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Strait of Hormuz) है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी संकरे समुद्री मार्ग से होता है। सैन्य टकराव और हवाई हमलों के बाद इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है।
इसके परिणाम स्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें रिकॉर्ड स्तर को छू चुकी हैं। कई विकासशील और तेल-आयातित देशों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगी हैं, पेट्रोल-डीजल की अभूतपूर्व किल्लत हो गई है और पूरी परिवहन व्यवस्था चरमरा गई है।
2. गरीब और आम आदमी पर सीधी मार: थाली से गायब होता पोषण
जब वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की सप्लाई ठप होती है, तो अर्थशास्त्र की सबसे पहली मार समाज के सबसे निचले तबके पर पड़ती है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार इस संकट से किस प्रकार लहूलुहान हो रहा है, इसके प्रामाणिक पहलू निम्नलिखित हैं:
रसोई गैस और ईंधन की किल्लत: खाड़ी देशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई बाधित होने से घरेलू एलपीजी सिलेंडरों के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में गरीब परिवारों के सामने एक बार फिर धुएं और लकड़ी के पुराने दौर में लौटने की मजबूरी आ गई है।
रसद और परिवहन लागत का अभूतपूर्व बढ़ना: डीजल की कमी और इसकी आसमान छूती कीमतों के कारण ट्रकों का भाड़ा तेजी से बढ़ा है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं जैसे आलू, प्याज, हरी सब्जियां, दूध और दालों पर पड़ा है। थोक मंडियों से खुदरा बाजार तक आते-आते ये चीजें दोगुनी कीमतों पर बिक रही हैं, जिससे आम आदमी का बजट पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।
रोजगार पर संकट और छंटनी: बिजली और गैस की भारी किल्लत के कारण छोटे और लघु उद्योग (MSMEs) बंद होने की कगार पर हैं। कारखानों में उत्पादन घटने से सबसे पहली गाज दिहाड़ी मजदूरों और संविदा कर्मचारियों पर गिर रही है। उनकी दैनिक कमाई या तो बंद हो गई है या बेहद कम हो गई है, जबकि खर्च दोगुना हो चुका है।
दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना: पेट्रोकेमिकल्स का उपयोग दवाओं के कच्चे माल (API) और पैकेजिंग में बड़े पैमाने पर होता है। ईंधन संकट के कारण जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें भी बढ़ रही हैं, जो गरीब के लिए किसी दोहरी मार से कम नहीं है।
3. कृषि पर संकट: खाद्यान्न सुरक्षा को गंभीर खतरा
खाड़ी देश दुनिया में पेट्रोकेमिकल्स और रासायनिक उर्वरकों (Fertilizers) के बहुत बड़े उत्पादक और निर्यातक हैं। गैस की सप्लाई ठप होने से वैश्विक स्तर पर खाद का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यूरिया और डीएपी (DAP) जैसे जरूरी उर्वरकों की कमी और बढ़ती कीमतों के कारण किसानों की लागत बढ़ गई है। यदि यह संकट लंबा खिंचा, तो आने वाले महीनों में फसलों का उत्पादन घटेगा, जिससे बाजार में अनाज की भारी कमी होगी और देश में ‘खाद्यान्न संकट’ (Food Security Crisis) खड़ा होने की पूरी आशंका है।
4. युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं: कूटनीतिक विफलता
इतिहास गवाह है कि मिसाइलों और बमों से कभी स्थायी शांति नहीं खरीदी जा सकती। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और ईरान के जवाबी मिसाइल व ड्रोन हमलों ने मध्य-पूर्व (Middle East) को बारूद का ढेर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) और वैश्विक महाशक्तियां इस संकट को समय रहते टालने में पूरी तरह नाकाम रही हैं। एक तरफ जहां बड़े देश अपनी कूटनीतिक जिद और राजनीतिक अहं पर अड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया का गरीब और मध्यम वर्ग इस युद्ध की सबसे भारी आर्थिक कीमत चुका रहा है।
शांति का मार्ग: संकट के समाधान के सूत्र
इस वैश्विक संकट से निकलने के लिए अब दुनिया को युद्ध की भाषा छोड़कर कूटनीति के मेज पर आना ही होगा। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाने अनिवार्य हैं:
तत्काल और स्थायी युद्धविराम (Ceasefire): अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए जो संघर्ष विराम की कोशिशें हुई हैं, उन्हें बिना किसी शर्त के स्थायी रूप से लागू किया जाना चाहिए। सैन्य ठिकानों पर हमले तुरंत रुकने चाहिए।
हॉर्मुज जलमार्ग को ‘नो-वॉर ज़ोन’ घोषित करना: वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम जनता को भूख से बचाने के लिए स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को तुरंत अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए सुरक्षित और खुला किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा में तेल टैंकरों को रास्ता दिया जाए ताकि वैश्विक ईंधन आपूर्ति बहाल हो सके।
भारत जैसी महाशक्तियों की मध्यस्थता: वर्तमान समय में भारत जैसे देश, जिसके संबंध अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों से ही बेहतर हैं, एक बड़े ‘पीस मेकर’ (शांति दूत) की भूमिका निभा सकते हैं। वैश्विक मंचों पर गुटनिरपेक्ष और संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर ही इन देशों को बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है।
राशन और जन-कल्याणकारी योजनाओं को सुदृढ़ करना: सरकारों को चाहिए कि वे इस संकट के समय अपने ‘सामरिक तेल भंडार’ का उपयोग करें और साथ ही गरीब तबके को महंगाई से बचाने के लिए मुफ्त या रियायती अनाज तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को दोगुना करें।
निष्कर्ष
आज का विश्व ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और परस्पर निर्भरता के सिद्धांत पर चलता है। अगर खाड़ी में बम गिरेंगे, तो उसकी गूंज और दर्द दुनिया के हर कोने के रसोईघर और एक गरीब की खाली होती थाली में महसूस होगी। अमेरिका, ईरान और इजराइल को यह समझना होगा कि इस युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा; अंततः हार मानवता, मासूम बच्चों, गरीबों और वैश्विक विकास की ही होगी।
समय आ गया है कि महाशक्तियां अपने अहं को छोड़कर वैश्विक शांति, मानवता और आर्थिक स्थिरता के लिए जिम्मेदार रवैया अपनाएं, अन्यथा यह महंगाई और मंदी दुनिया को एक ऐसे अंधेरे युग में ले जाएगी जिससे उबरने में दशकों लग जाएंगे।





