मदन मोहन पाठक
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। हिमालय की गोद में बसे इस राज्य की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और सरल जीवन शैली से रही है। किंतु विडंबना यह है कि आज यही देवभूमि अपने अस्तित्व के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती—पलायन—से जूझ रही है। यह केवल जनसंख्या का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानवीय संकट का वह चेहरा है जो धीरे-धीरे पूरे पर्वतीय समाज को प्रभावित कर रहा है।
आज उत्तराखंड के हजारों गांव ऐसे हैं जहां कभी बच्चों की किलकारियां, खेतों में किसानों की मेहनत और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। कई गांवों में केवल बुजुर्ग रह गए हैं, जबकि युवा बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं।
पलायन क्या है और क्यों है चिंता का विषय?
पलायन का अर्थ है किसी व्यक्ति या समुदाय का बेहतर जीवन, रोजगार, शिक्षा या अन्य सुविधाओं की तलाश में अपने मूल निवास स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर बस जाना। सामान्य परिस्थितियों में यह एक सामाजिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब किसी क्षेत्र से लगातार बड़ी संख्या में लोग पलायन करने लगें और गांव खाली होने लगें, तब यह चिंता का विषय बन जाता है।
उत्तराखंड में पलायन इसी श्रेणी की समस्या है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी बन चुका है।
उत्तराखंड में पलायन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण लंबे समय से लोग सेना, शिक्षा और सरकारी सेवाओं में रोजगार के लिए बाहर जाते रहे हैं। लेकिन राज्य गठन (2000) के बाद लोगों को उम्मीद थी कि स्थानीय स्तर पर विकास होगा और पलायन रुकेगा।
दुर्भाग्य से पिछले दो दशकों में पलायन की समस्या कम होने के बजाय कई क्षेत्रों में और बढ़ी है। सड़क, शिक्षा और संचार सुविधाओं में सुधार तो हुआ, लेकिन रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया।
पलायन के प्रमुख कारण
1. रोजगार के सीमित अवसर
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में उद्योगों का अभाव है। कृषि भी अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा पर निर्भर है और छोटे जोतों में सीमित उत्पादन होता है। युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिल पाता, इसलिए वे देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई और अन्य महानगरों की ओर रुख करते हैं।
उदाहरण के तौर पर अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चमोली के हजारों युवा रोजगार की तलाश में वर्षों से दिल्ली-एनसीआर और अन्य राज्यों में कार्यरत हैं।
2. शिक्षा की बेहतर सुविधाओं का अभाव
हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है, लेकिन उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा के गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की कमी अब भी कई क्षेत्रों में महसूस की जाती है। माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए शहरों में बसना अधिक सुरक्षित समझते हैं।
3. स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, आधुनिक उपकरणों और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव लंबे समय से बना हुआ है। गंभीर बीमारी की स्थिति में लोगों को मैदानी क्षेत्रों की ओर जाना पड़ता है।
4. कृषि की घटती उपयोगिता
बंदर, सूअर और अन्य जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने खेती को नुकसान पहुंचाया है। लागत बढ़ने और लाभ कम होने के कारण किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
5. सड़क और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
आज भी अनेक गांव ऐसे हैं जहां सड़क, पेयजल, इंटरनेट और अन्य बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी हैं। इससे लोगों का जीवन कठिन बना रहता है।
खाली होते गांव: एक दर्दनाक सच्चाई
उत्तराखंड के अनेक गांव आज “भूतिया गांव” या “निर्जन गांव” के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। ऐसे गांव जहां कभी दर्जनों परिवार रहते थे, आज वहां ताले लगे मकान दिखाई देते हैं।
अल्मोड़ा, पौड़ी, चमोली, टिहरी और पिथौरागढ़ के अनेक गांवों में आबादी तेजी से घटी है। कई गांवों में केवल बुजुर्ग दंपति या कुछ परिवार ही शेष रह गए हैं।
एक समय जिन खेतों में गेहूं, मंडुवा, झंगोरा और अन्य फसलें लहलहाती थीं, वे आज झाड़ियों और वनस्पतियों से भरते जा रहे हैं।
पलायन के सामाजिक दुष्प्रभाव
परिवारों का विघटन
जब युवा रोजगार के लिए बाहर चले जाते हैं तो गांवों में बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। इससे पारिवारिक संरचना कमजोर होती है।
लोक संस्कृति पर खतरा
लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक पर्व और रीति-रिवाज धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहे हैं। नई पीढ़ी का अपने गांव और संस्कृति से जुड़ाव कम होता जा रहा है।
कृषि भूमि का परित्याग
बड़ी मात्रा में कृषि भूमि बंजर होती जा रही है। इससे खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
खाली गांवों में सामाजिक गतिविधियां कम हो जाती हैं, जिससे स्थानीय सुरक्षा और सामुदायिक जीवन पर भी असर पड़ता है।
पलायन के बीच उम्मीद की किरण
स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। उत्तराखंड में अनेक ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जहां लोगों ने गांव लौटकर नई शुरुआत की है।
होमस्टे मॉडल
पर्यटन आधारित होमस्टे योजनाओं ने कई ग्रामीण परिवारों को आय का नया स्रोत दिया है। नैनीताल, चमोली, रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ के अनेक गांव इसका उदाहरण हैं।
जैविक खेती और स्वरोजगार
कुछ युवाओं ने जैविक खेती, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, फल प्रसंस्करण और औषधीय पौधों की खेती को अपनाकर सफलता प्राप्त की है।
महिला स्वयं सहायता समूह
महिलाओं के स्वयं सहायता समूह स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाकर आर्थिक सशक्तीकरण का नया मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं।
समाधान की दिशा में आवश्यक कदम
स्थानीय रोजगार सृजन
हर जिले की भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार रोजगार आधारित योजनाएं विकसित करनी होंगी।
पर्यटन को गांवों तक पहुंचाना
ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे, ट्रैकिंग और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देकर युवाओं को स्थानीय रोजगार दिया जा सकता है।
कृषि का आधुनिकीकरण
जैविक खेती, ड्रिप सिंचाई, प्रसंस्करण इकाइयों और विपणन सुविधाओं को बढ़ावा देना आवश्यक है।
शिक्षा और स्वास्थ्य का सुदृढ़ीकरण
गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, महाविद्यालय, अस्पताल और डिजिटल सुविधाएं गांवों के निकट उपलब्ध करानी होंगी।
डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार
इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के माध्यम से युवाओं को ऑनलाइन रोजगार, स्टार्टअप और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में पलायन केवल आंकड़ों का विषय नहीं है; यह उन खाली होते आंगनों की कहानी है जहां कभी जीवन की चहल-पहल थी। यह उन बुजुर्ग आंखों की प्रतीक्षा है जो अपने बच्चों के लौटने का इंतजार करती हैं। यह उन बंद मकानों की खामोशी है जो कभी परिवारों की खुशियों से आबाद थे।
पलायन को पूरी तरह रोकना संभव नहीं हो सकता, लेकिन इसे विवशता के बजाय विकल्प बनाया जा सकता है। यदि गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, तो उत्तराखंड के युवा अपने गांवों में रहकर भी समृद्ध भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, समाज, शिक्षण संस्थान और स्वयं युवा मिलकर ऐसी विकास यात्रा का निर्माण करें जिसमें पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, दोनों पहाड़ के काम आ सकें। तभी उत्तराखंड के गांव फिर से आबाद होंगे और देवभूमि की आत्मा पुनः मुस्कुराएगी।
“खाली होते गांव केवल घरों के खाली होने की कहानी नहीं हैं, वे हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों, सामाजिक रिश्तों और सामूहिक भविष्य के कमजोर पड़ने की चेतावनी भी हैं।”





