डॉ. मदन मोहन पाठक
(स्वतंत्र लेखक एवं चिंतक)
आज मानव इतिहास एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उपलब्धियों के शिखर और संकटों की गहराइयाँ एक साथ दिखाई देती हैं। मनुष्य ने विज्ञान की शक्ति से आकाश को माप लिया, समुद्र की गहराइयों को छू लिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से मशीनों को सोचने की क्षमता तक प्रदान कर दी। लेकिन इस समूची प्रगति के बीच एक कटु सत्य यह भी है कि मनुष्य स्वयं को जानने और अपने भीतर शांति खोजने में लगातार असफल होता जा रहा है।
विश्व के अनेक क्षेत्र युद्ध की ज्वालाओं में जल रहे हैं। परमाणु हथियारों की होड़ मानव सभ्यता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है। आतंकवाद, हिंसा, कट्टरता और भू-राजनीतिक संघर्षों ने वैश्विक शांति को अस्थिर बना दिया है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, हिमनदों का पिघलना, नदियों का प्रदूषण, घटते वन और विषैली होती वायु प्रकृति के संतुलन को चुनौती दे रहे हैं। मानव जीवन के मूलाधार—जल, वायु और अन्न—तीनों संकट के दौर से गुजर रहे हैं।
आज जिस वायु को प्राण कहा गया था, वही अनेक नगरों में रोगों का कारण बन रही है। जिस जल को भारतीय संस्कृति ने अमृत की संज्ञा दी, वही अनेक स्थानों पर प्रदूषण का शिकार है। जिस अन्न को देवत्व प्रदान किया गया, वही रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और कृत्रिम पदार्थों के बोझ तले अपनी प्राकृतिक पवित्रता खोता जा रहा है। परिणामस्वरूप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर, अवसाद, अनिद्रा और मानसिक तनाव जैसी बीमारियाँ मानव जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं।
विडम्बना यह है कि चिकित्सा विज्ञान जितनी तेजी से विकसित हुआ है, मानसिक अशांति भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। सम्पत्ति बढ़ी है, लेकिन प्रसन्नता कम हुई है। संचार के साधन बढ़े हैं, लेकिन आत्मीय संवाद कम हो गए हैं। ऐसे समय में भारत की प्राचीन योग परंपरा केवल एक स्वास्थ्य पद्धति नहीं, बल्कि मानवता के लिए आशा का प्रकाशस्तंभ बनकर उभरती है।
भारत की सनातन मेधा का अनुपम उपहार
योग किसी व्यक्ति, संप्रदाय या युग की देन नहीं है। यह भारत की सनातन चेतना का वह अमर ज्ञान है, जिसे ऋषियों और मनीषियों ने हजारों वर्षों की तपस्या, साधना और अनुभव से मानवता को प्रदान किया। भारतीय परंपरा में भगवान शिव को ‘आदियोगी’ कहा गया है। मान्यता है कि उन्होंने सप्तर्षियों को योग का प्रथम उपदेश देकर इस ज्ञान को विश्व तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया।
वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता और पुराणों में योग का विस्तृत वर्णन मिलता है। परंतु योग को व्यवस्थित और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय महर्षि पतंजलि को जाता है। उनके द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग आज भी मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास की सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका माना जाता है।
महर्षि पतंजलि का सूत्र—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
अर्थात मन की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है।
आज जब मनुष्य निरंतर सूचना-विस्फोट, प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव के बीच जी रहा है, तब यह परिभाषा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठती है।
योग : केवल व्यायाम नहीं, जीवन का विज्ञान
दुर्भाग्य से आधुनिक समाज का एक बड़ा वर्ग योग को केवल शारीरिक आसनों तक सीमित समझता है। वास्तव में योग जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है। यह शरीर को स्वस्थ, मन को शांत, बुद्धि को निर्मल और आत्मा को जागृत करने का विज्ञान है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने योग को कर्म, समत्व और आत्मनियंत्रण से जोड़ा है—
“योगः कर्मसु कौशलम्”
अर्थात कर्मों में उत्कृष्टता ही योग है।
और—
“समत्वं योग उच्यते”
अर्थात परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव में भी मन का संतुलित रहना ही योग है।
स्पष्ट है कि योग केवल आसनों का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने की कला है।
आधुनिक संकटों का शाश्वत समाधान
कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को यह अनुभव कराया कि केवल दवाइयाँ ही पर्याप्त नहीं हैं; मजबूत प्रतिरोधक क्षमता, मानसिक संतुलन और सकारात्मक जीवन दृष्टि भी उतनी ही आवश्यक है। उस कठिन समय में योग और प्राणायाम ने करोड़ों लोगों को शारीरिक और मानसिक शक्ति प्रदान की।
आज जब विश्व तनाव, अवसाद और अकेलेपन की महामारी से जूझ रहा है, तब योग मनुष्य को स्वयं से पुनः जोड़ने का कार्य कर रहा है। यह मनुष्य को सिखाता है कि शांति बाहर नहीं, भीतर प्राप्त होती है; सुख वस्तुओं में नहीं, दृष्टिकोण में निहित है।
वसुधैव कुटुम्बकम् का जीवंत स्वरूप
योग का दर्शन भारतीय संस्कृति के उस महान आदर्श का विस्तार है—
“वसुधैव कुटुम्बकम्”
अर्थात सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
योग किसी धर्म, जाति, भाषा या राष्ट्र की सीमाओं में बंधा नहीं है। अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका तक योग का व्यापक प्रसार इस बात का प्रमाण है कि यह सम्पूर्ण मानवता की आवश्यकता बन चुका है।
भारतीय संस्कृति का यह मंत्र—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः”
योग की आत्मा है। योग केवल स्वयं के स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का मार्ग है।
उपसंहार : मानवता को स्वयं से जोड़ने का अभियान
21 जून का अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता के आत्मचिंतन का दिवस है। यह हमें स्मरण कराता है कि वास्तविक विकास वही है जिसमें मनुष्य स्वस्थ हो, समाज शांत हो, प्रकृति सुरक्षित हो और जीवन संतुलित हो।
आज आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवल एक दिवस के कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे जीवन का अनिवार्य संस्कार बनाया जाए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, परिवारों और सामाजिक संस्थाओं में योग को दैनिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
विश्व के सामने खड़े युद्ध, प्रदूषण, तनाव, नैतिक पतन और मानसिक असंतुलन जैसे संकटों का स्थायी समाधान केवल बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं होगा। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर लौटना होगा। योग उसी आंतरिक यात्रा का मार्ग है।
यदि इक्कीसवीं सदी को वास्तव में मानवता की सदी बनाना है, तो विज्ञान के साथ विवेक, प्रगति के साथ संतुलन और शक्ति के साथ शांति को भी अपनाना होगा। योग इन तीनों का सेतु है।
आज जब संसार भय, संघर्ष और असंतुलन के दौर से गुजर रहा है, तब भारत की प्राचीन योग परंपरा सम्पूर्ण विश्व के लिए एक अमृत संदेश लेकर खड़ी है—
स्वयं को जानो, स्वयं को साधो और स्वयं को समस्त सृष्टि से जोड़ो।
यही योग है।,यही स्वास्थ्य है।
यही शांति है।और यही मानवता का भविष्य है।
करें योग, रहें निरोग;जुड़ें योग से, जुड़ें जीवन से।





