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July 9, 2026

अमेरिका–ईरान: जंग का वह अंत जो शुरू ही नहीं हुआ, और समझौते की वह मेज जो कभी सज नहीं पाई

News Deskby News Desk
in उत्तराखंड, राजनीति, विदेश, शिक्षा
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अमेरिका–ईरान: जंग का वह अंत जो शुरू ही नहीं हुआ, और समझौते की वह मेज जो कभी सज नहीं पाई
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अमेरिका–ईरान: जंग का वह अंत जो शुरू ही नहीं हुआ, और समझौते की वह मेज जो कभी सज नहीं पाई

– डॉ. मदन मोहन पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

दुनिया के राजनीतिक मानचित्र पर दो ऐसे देश हैं, जिनके बीच युद्ध का औपचारिक ऐलान कभी नहीं हुआ, लेकिन संघर्ष शायद ही कभी थमा हो। एक ओर अमेरिका, दूसरी ओर ईरान।

गोले इराक में गिरते हैं, मिसाइलें सीरिया में दागी जाती हैं, ड्रोन लाल सागर में उड़ते हैं और खून गाजा की गलियों में बहता है, लेकिन असली मुकाबला हमेशा वॉशिंगटन और तेहरान के बीच होता है। यह ऐसा युद्ध है, जिसकी कोई घोषित शुरुआत नहीं, कोई तय मोर्चा नहीं और फिलहाल कोई स्पष्ट अंत भी नहीं।

आज सवाल यह नहीं कि युद्ध होगा या नहीं। सच यह है कि युद्ध वर्षों से जारी है—बस उसका चेहरा बदलता रहता है। असली सवाल यह है कि जब दोनों देश बातचीत की जरूरत समझते हैं, तब भी समझौता क्यों नहीं हो पाता?

इसका जवाब हथियारों से अधिक इतिहास, अविश्वास और राजनीतिक अहंकार में छिपा है।

1979 की वह घटना, जिसकी परछाईं आज भी मौजूद है

अमेरिका और ईरान के रिश्तों की सबसे गहरी दरार 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पड़ी, जब तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास के 52 राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाया गया।

तब से अमेरिका की राजनीतिक सोच में ईरान एक “खतरनाक विरोधी” बना रहा, जबकि ईरान की सत्ता व्यवस्था में अमेरिका “महाशैतान” की राजनीतिक छवि का हिस्सा बन गया।

यही कारण है कि अमेरिका में कोई भी राष्ट्रपति ईरान के प्रति नरम रुख अपनाए तो विपक्ष उसे कमजोरी बताता है, और ईरान में कोई भी नेता अमेरिका से समझौते की बात करे तो उसे क्रांति की मूल भावना से समझौता करने वाला बताया जाता है।

यानी दोनों देशों की घरेलू राजनीति ही टकराव को जीवित रखने में भूमिका निभाती है।

परमाणु कार्यक्रम नहीं, भरोसे का संकट असली मुद्दा

2015 में बराक ओबामा के कार्यकाल में हुआ JCPOA केवल परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं था, बल्कि दशकों के अविश्वास के बीच खुली एक छोटी-सी खिड़की भी था।

लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका को उस समझौते से बाहर निकालने के बाद ईरान का भरोसा लगभग समाप्त हो गया।

ईरान का तर्क है—यदि एक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर अगले राष्ट्रपति के आने पर निरर्थक हो जाएँ, तो किसी नए समझौते की विश्वसनीयता क्या होगी?

वहीं अमेरिका का कहना है कि केवल यूरेनियम संवर्धन रोकना पर्याप्त नहीं है। उसे ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल नीति और क्षेत्रीय सहयोगी सशस्त्र समूहों की गतिविधियों पर भी ठोस आश्वासन चाहिए।

यहीं वार्ता बार-बार ठहर जाती है।

ईरान कहता है—”परमाणु मुद्दे पर बात कीजिए।”

अमेरिका कहता है—”पहले पूरे क्षेत्रीय व्यवहार पर भरोसा दिखाइए।”

और बातचीत शुरू होने से पहले ही रुक जाती है।

यह संघर्ष इसलिए भी जारी है क्योंकि सीमित तनाव दोनों के लिए उपयोगी माना जाता है

यही इस पूरे समीकरण का सबसे कठिन और विवादास्पद पक्ष है।

ईरान के लिए बाहरी दबाव और अमेरिकी प्रतिबंध घरेलू चुनौतियों के बीच राष्ट्रीय एकजुटता का राजनीतिक आधार बन जाते हैं। बाहरी खतरे की भावना कई बार आंतरिक असंतोष से ध्यान हटाने में मदद करती है।

दूसरी ओर अमेरिका के लिए मध्य-पूर्व में ईरान की चुनौती उसके सुरक्षा गठबंधनों, सैन्य उपस्थिति और क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बनी रहती है।

यानी दोनों पक्ष प्रत्यक्ष पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं, लेकिन इतना तनाव बनाए रखना भी उनके रणनीतिक हितों का हिस्सा माना जाता है कि शक्ति संतुलन बना रहे।

तो क्या कभी अंत होगा?

संभव है, लेकिन शायद किसी ऐतिहासिक शांति संधि से नहीं।

जब तक ईरान परमाणु क्षमता विकसित करने की स्थिति में रहेगा और अमेरिका उसके सैन्य ढांचे को गंभीर क्षति पहुँचाने की क्षमता रखेगा, तब तक दोनों एक-दूसरे को प्रत्यक्ष युद्ध से रोकने की कोशिश करते रहेंगे। अंतरराष्ट्रीय रणनीति की भाषा में इसे “Deterrence by Punishment” कहा जाता है।

समझौता तभी संभव होगा, जब दोनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि टकराव बनाए रखने की कीमत, समझौता करने की राजनीतिक कीमत से अधिक हो गई है।

फिलहाल ऐसा दिखाई नहीं देता।

निष्कर्ष

एक पत्रकार के रूप में मेरा आकलन है कि वॉशिंगटन और तेहरान में संवाद के मसौदे शायद तैयार हों, कलमों में स्याही भी भरी हो, लेकिन हस्ताक्षर करने का साहस दोनों के लिए राजनीतिक जोखिम बन जाता है।

यही कारण है कि युद्ध बिना औपचारिक घोषणा के जारी है और शांति बिना विश्वास के।

 

दुनिया बार-बार पूछती है—”युद्ध कब खत्म होगा?”

शायद सही सवाल यह है—”क्या दोनों पक्ष वास्तव में उसे खत्म करना भी चाहते हैं?”

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