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July 12, 2026

एकादशी व्रत  स्मार्त और वैष्णव का शास्त्रसम्मत स्वरूप — विवाद नहीं, कर्तव्य और समर्पण का पर्व  

News Deskby News Desk
in उत्तराखंड, ज्योतिष, देश, धार्मिक, शिक्षा
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एकादशी व्रत  स्मार्त और वैष्णव का शास्त्रसम्मत स्वरूप — विवाद नहीं, कर्तव्य और समर्पण का पर्व  
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डॉ. मदन मोहन पाठक

वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य एवं वरिष्ठ पत्रकार_

सनातन धर्म में जितने भी व्रत-पर्व बताए गए हैं, उनमें एकादशी का स्थान सर्वोपरि और सर्वाधिक फलदायी माना गया है। एकादशी को शास्त्रों में “हरिवासर”, “पापनाशिनी”, “मोक्षदा” और “भक्तिवर्धिनी” तिथि कहा गया है। _पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्यपुराण_ तथा _आचार्य श्री सनातन गोस्वामी प्रणीत हरिभक्तिविलास_ जैसे प्रमाणिक ग्रंथों में एकादशी व्रत की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।

 

शास्त्र वचन है —

*_«एकादश्यां निराहारो यो भुङ्क्ते द्वादशीदिने।

विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वपापैः प्रमुच्यते॥»__

अर्थात जो श्रद्धालु एकादशी को निराहार रहकर द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करता है, वह भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा से समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

 

परंतु दुर्भाग्य की बात है कि आज प्रत्येक एकादशी के अवसर पर सनातनी समाज में एक ही प्रश्न उठता है और वही विवाद का कारण बन जाता है — *”आज व्रत किस दिन करें? स्मार्त एकादशी करें या वैष्णव एकादशी?”* यह जिज्ञासा यदि शास्त्रसम्मत चर्चा तक सीमित रहे तो कल्याणकारी है, परंतु जब यह कटुता, निंदा और परस्पर आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है, तब व्रत का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। धर्म का लक्ष्य आत्मकल्याण है, न कि परस्पर द्वेष।

 

*स्मार्त और वैष्णव : दो परम्पराएँ, एक ही लक्ष्य*

 

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि “स्मार्त” और “वैष्णव” ये शब्द किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता या हीनता के प्रमाणपत्र नहीं हैं। ये दोनों ही भगवान श्रीहरि तक पहुँचने के दो प्राचीन और प्रमाणिक मार्ग हैं। अंतर केवल आचार, तिथि-निर्णय और साधना पद्धति का है।

 

*1. स्मार्त कौन हैं और उनके कर्तव्य क्या हैं?*

“स्मार्त” शब्द “स्मृति” से बना है। _मनुस्मृति 2.6_ में धर्म के चार आधार बताए गए हैं — *«वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः»*। अर्थात वेद, स्मृति, श्रेष्ठजनों का आचार और शुद्ध अंतःकरण। इसी स्मृति को आधार मानकर _निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु, व्रतराज, स्मृतिमुक्ताफल_ जैसे ग्रंथों की रचना हुई।

 

स्मार्त परम्परा मुख्यतः गृहस्थ जीवन के लिए है। भारत का अधिकांश सनातनी गृहस्थ समाज अपने कुलाचार, पारिवारिक परम्परा, स्थानीय प्रामाणिक पंचांग और स्मार्त ग्रंथों के अनुसार ही व्रत-पर्व मनाता है।

 

*स्मार्त गृहस्थ के प्रमुख कर्तव्य:*

क. *कुलगुरु और कुलाचार का सम्मान* – जो परम्परा पीढ़ियों से चली आ रही है, उसका पालन करना।

ख. *उदयातिथि और पारण-शुद्धि पर बल* – स्मार्त निर्णय का मुख्य आधार “उदयकालीन तिथि” और “द्वादशी में शुद्ध पारण” है। _निर्णयसिन्धु_ में स्पष्ट लिखा है कि यदि एकादशी दशमी से विद्ध हो और अगले दिन शुद्ध द्वादशी का मान कम हो, तो व्रत अगले दिन किया जाता है, अन्यथा पारण के अभाव में व्रत निष्फल हो जाता है। शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया है कि अनुचित तिथि पर व्रत करने से संतान को कष्ट हो सकता है। इसलिए स्मार्त परम्परा पारण की शुद्धता को सर्वोपरि मानती है।

ग. *वेद-स्मृति सम्मत जीवन* – यज्ञ, दान, सेवा और वर्णाश्रम धर्म का पालन।

 

*2. वैष्णव कौन हैं और उनके कर्तव्य क्या हैं?*

“वैष्णव” केवल तिलक, माला या सम्प्रदाय का नाम नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने _श्रीमद्भगवद्गीता 12.13-14_ में अपने प्रिय भक्त के लक्षण स्वयं बताए हैं — *«अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥»*। _श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.45_ भी कहता है — *«सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः»*। अर्थात जो समस्त प्राणियों में भगवान का दर्शन करता है, वही श्रेष्ठ वैष्णव है।

 

वैष्णव परम्परा के आधार ग्रंथ _हरिभक्तिविलास_ है। श्री, ब्रह्म, रुद्र और सनकादि — ये चार वैष्णव सम्प्रदाय अपने-अपने आचार्यों द्वारा दिए गए नियमों का पालन करते हैं।

 

*वैष्णव के प्रमुख कर्तव्य:*

क. *आचार्य-परम्परा और शास्त्राज्ञा का पालन* – अपने सम्प्रदाय के आचार्य जो तिथि-निर्णय दें, उसे प्रमाण मानना।

ख. *अरुणोदय-विद्धा एकादशी का नियम* – _हरिभक्तिविलास 13.156_ में आज्ञा है — *«एकादशी व्रतं कुर्याद् द्वादशी संयुक्तं हि»*। अर्थात व्रत उसी एकादशी का होगा जिसमें द्वादशी का योग हो। यदि अरुणोदय काल में एकादशी द्वादशी से विद्ध हो, तो व्रत अगले दिन किया जाता है। वैष्णव परम्परा में व्रत की तिथि की शुद्धता को प्राथमिकता दी जाती है।

ग. *निष्काम भक्ति, नाम-जप, कीर्तन और वैष्णव-सेवा* – अहिंसा, दया, समता और पूर्ण समर्पण वैष्णव जीवन की पहचान है।

 

राजा अम्बरीष इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे आदर्श गृहस्थ राजा थे, परंतु _श्रीमद्भागवत_ में उन्हें परम वैष्णव कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि गृहस्थ होना वैष्णवता में बाधक नहीं है।

 

*तिथि में अंतर क्यों आता है? इसका शास्त्रीय कारण*

 

जब किसी दिन दशमी, एकादशी और द्वादशी — तीनों तिथियों का स्पर्श होता है, तब “तिथि-त्रय-योग” बनता है। ऐसी स्थिति में स्मार्त ग्रंथ “पारण में द्वादशी की पूर्णता” देखते हैं और वैष्णव ग्रंथ “एकादशी में द्वादशी का योग” देखते हैं। दोनों के पास अपने-अपने शास्त्रीय प्रमाण और हजारों वर्षों की परम्परा है। इसलिए इस एक दिन के अंतर को लेकर किसी एक पक्ष को “गलत” कहना नितांत अनुचित है।

 

*समाज के लिए आवश्यक संदेश और हमारा कर्तव्य*

 

आज समाज को आवश्यकता है विवाद की नहीं, समन्वय की। एकादशी का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना है, न कि एक-दूसरे को पराजित करना।

 

अतः सभी श्रद्धालुओं से मेरा विनम्र निवेदन है:

*पहला*, आप अपने स्थानीय प्रामाणिक पंचांग और अपने दीक्षा-गुरु अथवा कुल-गुरु के निर्देशानुसार ही व्रत करें। आधी-अधूरी जानकारी और सोशल मीडिया की भ्रांति में न पड़ें।

*दूसरा*, दूसरी परम्परा का सम्मान करें। जो स्मार्त निर्णय से व्रत कर रहा है वह भी धर्म पर है और जो वैष्णव निर्णय से कर रहा है वह भी। निंदा और कटाक्ष महापाप है।

*तीसरा*, व्रत का वास्तविक अर्थ समझें। केवल अन्न त्यागना व्रत नहीं है। _महाभारत_ कहता है *«अहिंसा परमो धर्मः»* और _भागवत 1.2.6_ का सार है *«स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥»*। अर्थात वही सर्वोच्च धर्म है जिससे भगवान में हेतुरहित, अटूट भक्ति उत्पन्न हो। यदि एकादशी के दिन मन में क्रोध, अहंकार और द्वेष है, तो व्रत का फल नहीं मिलता। परंतु यदि मन में जप, दान, सत्संग, सेवा और करुणा है, तो वही वास्तविक एकादशी है।

 

*निष्कर्ष*

 

एकादशी का पर्व हमें सिखाता है कि तिथि गौण है, भावना मुख्य है। चाहे आप स्मार्त परम्परा से व्रत करें या वैष्णव परम्परा से, यदि आपकी निष्ठा शुद्ध है और आप शास्त्र व गुरु की आज्ञा में हैं, तो आप दोनों ही भगवान श्रीहरि को प्रिय हैं।

आइए हम संकल्प लें कि हम एकादशी को “तर्क-युद्ध” का दिन नहीं, बल्कि “आत्मशुद्धि, समर्पण और सनातन धर्म की एकता” का पर्व बनाएंगे। क्योंकि अंततः भगवान यही देखेंगे — *«पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या

प्रयच्छति»* — _गीता 9.26_

_ॐ नमो भगवते वासुदेवाय*

 

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