— डॉ. मदन मोहन पाठक
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य एवं वरिष्ठ पत्रकार
“यहाँ तो बह रही बयार, कितने होंगे गिरफ्तार?”
यह कोई नारा नहीं, बल्कि हमारे समय का कटु यथार्थ है। लगभग हर दिन समाचारों में कहीं न कहीं एक मनचला गिरफ्तार होता है, किसी युवती का पीछा करने वाला पकड़ा जाता है, किसी बेटी से छेड़छाड़ करने वाला जेल भेजा जाता है। पुलिस की कार्रवाई तेज़ है, कानून सक्रिय है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या समाज भी उतनी ही तेजी से बदल रहा है?
आज पुलिस “ऑपरेशन प्रहार”, “मिशन शक्ति” और अनेक अभियानों के माध्यम से अपराधियों पर शिकंजा कस रही है। यह स्वागतयोग्य है। अपराधी को यह संदेश मिलना चाहिए कि महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने की कीमत चुकानी पड़ेगी।
किन्तु क्या हर गिरफ्तारी के बाद हम स्वयं से यह प्रश्न पूछते हैं कि ऐसे अपराधी तैयार कहाँ हो रहे हैं?
कोई भी युवक एक दिन में मनचला नहीं बनता। उसके भीतर यह विकृत सोच धीरे-धीरे जन्म लेती है। कहीं परिवार की उपेक्षा, कहीं संस्कारों का अभाव, कहीं अश्लील मनोरंजन का प्रभाव, कहीं नशे की प्रवृत्ति और कहीं महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु समझने वाली मानसिकता—ये सब मिलकर समाज के लिए एक खतरा तैयार करते हैं।
हमारे शास्त्र कहते हैं—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”
जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है; और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ शुभ कर्म भी निष्फल हो जाते हैं।
विडम्बना देखिए—एक ओर हम माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की पूजा करते हैं, दूसरी ओर समाज की बेटियों को सुरक्षित वातावरण देने में कई बार असफल दिखाई देते हैं। यह विरोधाभास केवल कानून से समाप्त नहीं होगा; इसके लिए समाज को आत्ममंथन करना होगा।
पुलिस अपराध होने के बाद कार्रवाई कर सकती है, लेकिन अपराध होने से पहले चरित्र निर्माण का कार्य परिवार, विद्यालय, समाज और संस्कारों को ही करना होगा। यदि बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाए कि हर महिला सम्मान की अधिकारी है, तो शायद पुलिस की केस डायरी भी हल्की हो जाएगी।
आज आवश्यकता केवल यह जानने की नहीं है कि “कितने गिरफ्तार हुए?” बल्कि यह भी पूछने की है कि “कितने युवाओं को सही संस्कार मिले?”
यदि हर पिता अपने पुत्र को मर्यादा सिखाए, हर माता संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाए, हर शिक्षक चरित्र निर्माण को शिक्षा का हिस्सा बनाए और समाज महिलाओं के सम्मान को अपनी संस्कृति का आधार माने, तो अपराधों का ग्राफ स्वतः नीचे आने लगेगा।
पुलिस का डंडा अपराधी को रोक सकता है, परन्तु संस्कार ही अपराध को जन्म लेने से रोकते हैं।
इसलिए आज सबसे बड़ा अभियान केवल “ऑपरेशन प्रहार” नहीं, बल्कि “ऑपरेशन संस्कार” होना चाहिए। जिस दिन यह अभियान हर घर में प्रारम्भ हो जाएगा, उस दिन शायद समाचारों की सुर्खियाँ बदल जाएँगी।
तब कोई यह नहीं पूछेगा—
“यहाँ तो बह रही बयार, कितने होंगे गिरफ्तार?”
बल्कि समाज गर्व से कहेगा—
“यहाँ तो बह रही संस्कारों की बयार,
बेटियाँ हैं सुरक्षित, यही है हमारा वास्तविक श्रृंगार।”
समाज तभी महान बनता है, जब उसकी बेटियाँ बिना भय के मुस्कुराते हुए घर से निकल सकें। यही सभ्यता की असली पहचान है, यही सनातन संस्कृति का सार है।




